फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Business archives ›   companies are being closed due to inflation

महंगाई लगा रही है कारखानों में ताले

Tue, 30 Apr 2013 11:15 PM IST
प्रियंवदा सहाय/नई दिल्ली
प्रियंवदा सहाय/नई दिल्ली Updated Tue, 30 Apr 2013 11:15 PM IST
विज्ञापन
companies are being closed due to inflation

श्रम नीति और रोजगार से ज्यादा अब महंगाई और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे कारखानों की तालाबंदी बढ़ा रहे हैं।

विज्ञापन


इस कारण देश में होने वाले छोटे-बड़े हड़तालों की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है, जिसका खमियाजा सरकार और कंपनियां दोनों को उठाना पड़ रहा है।

मजदूर संगठनों की मानें, तो इन हड़तालों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन देने वालों की संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है।

मजदूर संगठनों का मानना है कि महंगाई के इस दौर में कामगारों को पूरी सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन सरकार का ध्यान इस ओर नहीं है।

सीपीआई के नेता गुरुदास दास गुप्ता ने बताया कि 1 मई को देश भर में मजदूरों की दस मांगों को लेकर प्रदर्शन किए जाएंगे। इसमें खाद्य वस्तुओं की महंगाई, न्यूनतम मजदूरी दस हजार रुपये मासिक, सबके लिए पेंशन, असंगठित मजदूरों के लिए अलग से कोष बनाने, नौजवानों को रोजगार के अवसर और श्रम कानूनों का कल-कारखानों में भरपूर इस्तेमाल जैसे मुद्दे शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि जब तक सरकार की मजदूर विरोधी नीतियां बंद नहीं होगी, हड़तालों की संख्या कम नहीं हो सकती है। बतौर दासगुप्ता ऐसे मामलों से निपटने के लिए सरकार को अपनी आर्थिक नीतियां कॉरपोरेट के बजाए आमजन के हित में तैयार करना चाहिए।
विज्ञापन


भारतीय मजदूर संघ के आंकड़ों पर गौर करें, तो 28 फरवरी 2012 को हुई देशव्यापी हड़ताल में करीब 10 करोड़ लोग शामिल हुए थे, जबकि इस वर्ष फरवरी में हुए दो दिवसीय हड़ताल में शामिल होने वालों की संख्या करीब 18 करोड़ थी।  राज्य स्तरीय, स्थानीय और छिटपुट हड़तालों की संख्या सैंकड़ों में है।
विज्ञापन
विज्ञापन


उल्लेखनीय है कि 20-21 फरवरी 2013 को हुए हड़ताल के बाद उद्योग जगत ने अर्थव्यवस्था को करीब 20 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान जाहिर किया था, जबकि दो दिवसीय हड़ताल के कारण 50 हजार करोड़ रुपये के बैकिंग ट्रांजेक्शन बाधित होने की बात भी उजागर हुई थी।

सीपीआई के महासचिव सुधाकर रेड्डी का कहना है कि अगर सरकार ट्रेड यूनियनों को मान्यता या पहचान देती, तो मारुति के मानेसर प्लांट या नोएडा के कारखानों में हुई वारदातों को रोका जा सकता था, लेकिन कारखानों में बड़े पैमाने पर हुई आगजनी और हिंसा की घटनाओं के बावजूद सरकार ने मजदूरों के संरक्षण के लिए आजतक कदम नहीं उठाए।


रेड्डी के मुताबिक यूपीए के कार्यकाल में सालाना पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक धन कॉरपोरेट हाउस को दिये जाने वाले लाभ, सब्सिडी या रियायत के तौर पर खर्च किया जाता रहा है। इस तुलना में मजदूरों के हित में होने वाले खर्च न के बराबर हैं। अगर इन मुद्दों पर सरकार समय रहते नहीं सोचती है, तो भविष्य में हड़तालों का स्वरूप और भी बड़ा हो सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed