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जानिए सिरदर्द कैसे बना कोल स्कैम?

Sat, 26 Jul 2014 08:38 AM IST
Updated Sat, 26 Jul 2014 08:38 AM IST
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coam scam is create more trouble for government and cbi

सुप्रीम कोर्ट की ओर से 126 कोयला खदानों का आवंटन रद्द होने की बढ़ती आशंकाओं के बीच कथित अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेजों और फाइलों को खोजना मोदी सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है।

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तमाम कोशिश के बावजूद गायब फाइलों और दस्तावेजों को खोजने की मशक्कत बेकार साबित हो रही है। कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक सीबीआई ने गायब फाइलें और दस्तावेजों की जांच के मामले में दो पीई (प्रिलिमनरी इन्कवायरी) दर्ज कर ली है।
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जांच एजेंसी ने गायब फाइलों के जिम्मेदार लोगों की पड़ताल भी शुरू कर दी है। इस बीच, राज्य सरकारों ने कोयला खदानों का मनमाने तरीके से आवंटन का ठीकरा पूर्व की एनडीए, यूपीए1 और यूपीए2 सरकारों को फोड़ा है। कोर्ट को हाल में दिए गए जवाब में मौैजूदा केंद्र सरकार ने भी माना है कि खदानों के आवंटन में गड़बड़ी हुई है। इन्हें ज्यादा पारदर्शी से बांटा जा सकता था।

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सीबीआई के हाथ नहीं लगे दस्तावेज

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बहरहाल सीबीआई और इस्पात, कोयला और खनन मंत्रालयों की तमाम कोशिश के बावजूद 30 जून, 2014 तक कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े 1,137 दस्तावेज ही बरामद हो सके थे। इनमें 677 फाइलें, 47 खनन योजनाएं, 230 आवेदन पत्र, 40 एजेंडा पत्र, 26 सीडी और अलग-अलग तरह के 107 दस्तावेज शामिल हैं।

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक कोयला मंत्रालय ने ये सारे दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए हैं। लेकिन अब भी कुछ दस्तावेज सीबीआई के हाथ नहीं लगे हैं। सीबीआई इन फाइलों को खोजने में लगी है।

कोल इंडिया से कहा खोजो दस्तावेज

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गायब फाइलों और दस्तावेजों में से ज्यादातर 1993 से 2005 के  बीच की हैं। यह समय कोयला खदानों के आवंटन के लिए विज्ञापन दिए जाने का पहले का है। उस समय आवेदन के लिए कोई तारीख निर्धारित नहीं की गई थी।

इससे जुड़े सभी मंत्रालयों, विभागों, कोल इंडिया लिमिटेड और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआई) को इन दस्तावेजों को खोजने के लिए कहा गया है।

दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में स्क्रीनिंग कमेटी के रिकार्ड और निजी कंपनियों के आवेदन पत्रों तक पहुंच जरूरी है ताकि उन घटनाओं के बारे में पता किया जा सके, जिनके आधार पर खदान आवंटन को मंजूरी दी गई या फिर इससे इनकार किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपना पक्ष जाहिर करने के लिए कहा

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इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों से आवंटन के मानकों के बारे में अपना पक्ष जाहिर करने को कहा था। इस पर राज्यों ने आवंटन की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर मढ़ दी है। झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने कहा है कि केंद्र की ओर से खदान आवंटित करना इस दिशा में संवैधानिक योजना की ओर से उठाया गया पहला कदम है।

आवंटन के सभी मामलों में केंद्र की ओर उठाया गया कदम ही अंतिम है। राज्य सरकारों ने कहा उन्होंने माइनिंग लीज (एमएल) और प्रोस्पेक्टिंग यानी पीएल देने के मामले में उन्होंने आवंटन से जुड़ी चिट्ठी की सभी शर्तों और नियमों का पालन किया है। साथ ही एमएल या पीएल के लिए सभी प्रावधानों का पालन किया गया है।

हालांकि इस पूरे मामले में ओडिशा सरकार का नजरिया थोड़ा अलग है। उसका कहना है खनन के पट्टे (माइनिंग लीज) के लिए पहले राज्य सरकार के पास आवेदन दाखिल करना चाहिए क्योंकि संबंधित खदान वाले इलाके पर उसका अधिकार होता है। राज्य सरकार के पास आवेदन दाखिल करने के बाद ही केंद्र सरकार की भूमिका पैदा होती है। एमएमडीआर कानून,1957 की उप धारा 5 (1) के तहत राज्य सरकार की अनुमति की सिफारिश हो जाने के बाद ही केंद्र कोयला खदान आवंटित करे।

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