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कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिए मंजूरी प्रक्रिया हो सरल
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
Updated Thu, 27 Nov 2014 09:14 AM IST
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तय समय सीमा के भीतर उत्पादन बढ़ाकर देश में कोयले की कमी पूरी करने की दिशा में काम कर रहा कोयला मंत्रालय चाहता है कि कोयला खानों के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया को सरल करते हुए इसमें कुछ ढील दी जाए।
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बताया जा रहा है कि कोयला मंत्रालय ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को इस संबंध में कुछ सुझाव भेजे हैं। कोयला मंत्रालय ने तर्क दिया है कि पर्यावरणीय मंजूरी में आसानी देश में कोयले का उत्पादन बढ़ाकर लक्ष्य हासिल करने में काफी मददगार साबित होगी।
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केंद्र सरकार के अधिकारियों का बताना है कि कोयला मंत्रालय ने पर्यावरण मंत्रालय को सुझाव दिया है कि कोयला खानों के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में कुछ संशोधन करते हुए इसे सरल बनाए, ताकि कोयले के उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सके। कोयला मंत्रालय के मुताबिक कई कोयला परियोजनाएं इस वक्त पर्यावरणीय मंजूरी से पहले ली जाने वाली पहले चरण की वन संबंधी मंजूरी (स्टेज-1 फॉरेस्ट क्लीयरेंस) को लेकर अटकी पड़ी हुई हैं।
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इस समस्या के समाधान के लिए कोयला मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि 50 फीसदी से कम वन भूमि वाली कोयला खानों में काम शुरू करने की मंजूरी कंपनियों की ओर से इस बात का वचन पत्र (अंडरटेकिंग) लेकर दे दी जाए, कि वन भूमि पर उत्खनन तब तक नहीं शुरू किया जाएगा, जब तक कि इसके लिए वन संबंधी मंजूरी (फॉरेस्ट क्लीयरेंस) नहीं मिल जाती। इसके अलावा कोयला मंत्रालय ने कोयले की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ाने में जुटी कोयला कंपनियों को भूमिगत उत्खनन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी से मुक्ति देने की बात भी पर्यावरण मंत्रालय से कही है।
कोयला मंत्रालय के मुताबिक कंपनियों को ऐसे स्थानों पर भूमिगत उत्खनन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी से मुक्त रखा जाए, जहां इससे भूमि की सतह पर इससे कोई व्यवधान या दुष्प्रभाव न होता हो। इसके अलावा कोयला मंत्रालय ने कोयले की खोज और ड्रिलिंग के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की बाध्यता को न रखा जाए, क्योंकि इसके चलते बहुत से प्रस्ताव राज्यों के स्तर पर लंबित पड़े हुए हैं।
पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मंजूरी की प्रक्रिया को सरलीकृत करके इसका समाधान किया जा सकता है। कोयला मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि 1.5 से 2 बार होल प्रति किलोमीटर तक के औसत से कोयले की खोज की ड्रिलिंग के लिए अग्रिम पर्यावरणीय मंजूरी की बाध्यता नहीं होनी चाहिए।
इसके अलावा पर्यावरणीय और वन मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए कोयला मंत्रालय ने कई अन्य सुझाव भी दिए हैं। इनमें 2006 के वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत पर्यावरणीय मंजूरी के लिए आवेदन से पहले अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेने की बाध्यता को खत्म किया जाना शामिल है। मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि एनओसी का प्रावधान उस वक्त के लिए रखा जाना चाहिए, जब कोयला उत्खनन के लिए राज्य सरकार द्वारा वनभूमि का हस्तांतरण कंपनी को किया जाए।
इसके अलावा कोयला खान की अधिकतम गहराई (फाइनल माइन) 40 से 60 मीटर से अधिक न होने पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जोर दिए जाने को लेकर कोयला मंत्रालय का कहना है कि यह बाध्यता कोयला उत्खनन के लिए आर्थिक लिहाज से ठीक नहीं है। इसलिए मंत्रालय को माइनिंग प्लान के तहत खान की फाइनल डेफ्थ को इस आधार स्वीकार करना चाहिए, जिससे कि जल स्तर को उचित स्तर पर बनाए रखा जाए।
इसके अलावा कोयला मंत्रालय ने वन एवं पर्यावरणीय मंजूरी और प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया का डिजिटलीकरण करने का भी सुझाव दिया है, ताकि मंजूरी की प्रक्रिया को तेज बनाते हुए इसमें पारदर्शिता लाई जा सके। इसके अलावा कोयला मंत्रालय ने कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिहाज से कदम उठाने वाले अधिकारियों से चूक के मामलों में नरमी भरा रवैया अपनाने का आग्रह भी किया है, ताकि राष्ट्रहित में कोयले का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा सके।