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'चिदंबरम ने आम आदमी को छोड़ा भगवान भरोसे'
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Fri, 01 Mar 2013 12:24 AM IST
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यह यूपीए सरकार का दसवां और अंतिम बजट है। इन दस बजटों में देश की विकास दर 8 फीसदी से घटकर पांच फीसदी पर आ पहुंची है। राजकोषीय घाटा जीडीपी के 2.5 फीसदी से बढ़कर 5 फीसदी के पार है। वहीं चालू खाता घाटा अब तक के सर्वोच्च स्तर 5.4 फीसदी पर है। दूसरी ओर महंगाई की मार और उच्च ब्याज दर अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए काफी है।
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वित्त मंत्री से उम्मीद थी कि वे आम आदमी को परेशान कर रही महंगाई की ओर ध्यान देंगे। लेकिन उन्होंने आम आदमी को भगवान भरोसे छोड़ दिया। साथ ही महंगाई की समस्या के मद्देनजर मौद्रिक या आपूर्ति पक्ष पर कोई ध्यान नहीं दिया। जहां तक चालू खाता घाटे की बात है तो ऐसा लगता है कि चिदंबरम को उम्मीद है विदेशी निवेशक खुद-ब-खुद देश में आ जाएंगे और हमारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा। इससे दयनीय सोच और क्या हो सकती है!
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देश में निवेश की स्थिति ठीक नहीं है और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार के प्रति डगमगाया हुआ है। ऐसे में अपेक्षा थी कि चिदंबरम कुछ ऐसे कदम उठाएंगे जिससे निवेशकों का भरोसा लौटे। बाजार में सरकार के सकारात्मक संकेत जाने से ऐसा माहौल बने जिससे उच्च विकास दर की ओर बढ़ने में देश को मदद मिल सके। लेकिन अफसोस कि वित्त मंत्री असफल रहे।
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यह भी देखने योग्य है कि रेल मंत्री पवन बंसल ने जैसे पूर्व रेल मंत्री की आलोचना अपने भाषण में की थी, वैसे ही चिदंबरम ने पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि खर्चों को तर्कसंगत बनाना जरूरी है। लेकिन उन्होंने खर्च की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया और अचानक ही उपयोगी खर्चों में कटौती कर दी। इसमें संशय नहीं कि खर्च में बढ़ी कटौती करने से भविष्य में मांग में कमी आएगी। इससे निश्चित तौर पर प्रत्येक व्यक्ति को अल्पावधि के लिए कष्ट उठाना पड़ सकता है।
सरकार की यह अजब नीति है कि वर्ष 2008-09 में आर्थिक मंदी देखी गई तो उस समय 2 लाख करोड़ रुपए के खर्च बढ़ाए गए, तब यह ठीक था। लेकिन मौजूदा वित्त वर्ष में वैश्विक मंदी बरकरार रहने के बावजूद खर्च में 60 हजार करोड़ रुपए की कटौती भी सरकार को ठीक लग रही है। यह देखते हुए कि पिछले पांच साल में बचत दर जीडीपी के 37 फीसदी से घटकर 30 फीसदी हो गई है, वित्त मंत्री को बचत को बढ़ावा देने वाले कदम उठाना चाहिए थे। लेकिन वे ऐसा करने में असफल रहे हैं। उम्मीद थी की प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को पेश किया जाएगा। लेकिन वह भी नहीं हो सका।
(यशवंत सिन्हा से बातचीत पर आधारित)