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चांद छाप यूरिया कारखाने को लगा सिस्टम का डंक

Mon, 21 Jan 2013 10:54 PM IST
कानपुर/संजय त्रिपाठी
कानपुर/संजय त्रिपाठी Updated Mon, 21 Jan 2013 10:54 PM IST
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chand brand urea factory will verge of closure

तीन प्लांट के जरिये प्रति दिन 2,250 टन यूरिया उत्पादन की क्षमता वाली कंपनी और चांद छाप यूरिया के लिए देश भर में जानी जाने वाली कंपनी कानपुर फर्टिलाइजर्स एंड सीमेंट लि. (केएफसीएल) में पिछले छह महीने से सिर्फ झाड़ू-पोछा ही लग रहा है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय द्वारा सब्सिडी एग्रीमेंट को लेकर बरती जा रही हीलाहवाली से प्लांट में बिना किसी उत्पादन के महीने के चार करोड़ रुपये का खर्च हो रहा है। नौबत यही तो वह दिन दूर नहीं जब एक बार फिर यह बंदी की कगार पर पहुंच जाएगी।

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देश में प्रति वर्ष लगभग 270 लाख टन यूरिया की आवश्यकता होती है। इसमें 200 लाख टन यूरिया का उत्पादन देश में होता है, जबकि 70 लाख टन यूरिया विदेशों से आयात किया जाता है। डंकन्स फर्टिलाइजर्स के बंद होने से यहां बनने वाला लगभग सात लाख टन यूरिया का उत्पादन ठप हो गया।
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बाईफर के निर्देशानुसार बीते वर्ष जेपी समूह ने इसका अधिग्रहण किया। प्लांट में अब तक लगभग एक हजार करोड़ का निवेश किया जा चुका है। बीते अगस्त तक यहां के तीनों प्लांट को चालू करके सफलतापूर्वक ट्रायल प्रोडक्शन भी किया गया। नाफ्था के बजाय इसे गैस से चलाने के लिए गेल से एग्रीमेंट भी हो चुका है। यहां तक की पाइपलाइन भी प्लांट के भीतर आ चुकी है। ज्यादा से ज्यादा मई माह तक तीनों प्लांट गैस से चलने की स्थिति में आ जाएंगे।
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केएफसीएल सूत्रों के मुताबिक यहां 40 मेगावाट का बिजली कनेक्शन है। प्लांट से स्टोर अमोनिया का तापमान स्थिर रखने, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट चलाने सहित अन्य कार्यों के लिए इसकी आवश्यकता होती है। प्रतिमाह एक करोड़ 90 लाख रुपये का बिजली बिल फिलहाल देना पड़ रहा है।

इसके अलावा बीते एक वर्ष से लगभग 940 कर्मचारियों को 2.5 करोड़ रुपये का मासिक वेतन भी दिया जा रहा है। वहीं ठेका श्रमिकों व अन्य मिलाकर लगभग 12 लाख रुपये महीने का खर्च हो रहा है। सूत्रों की मानें तो अधिग्रहण के वक्त शर्तों के मुताबिक प्लांट दुरुस्त होते ही फर्टिलाइजर मिनिस्ट्री सब्सिडी का एग्रीमेंट करेगी।

साथ ही कम से कम तीन वर्षों तक इसे नाफ्था से चलाने की अनुमति भी दी जाएगी। बावजूद इसके एक साल से यह एग्रीमेंट लटका हुआ है। नाफ्था से प्रति टन यूरिया की निर्माण लागत लगभग तीस हजार रुपये आती है, जबकि किसानों को यह लगभग नौ हजार रुपये प्रति टन के भाव से मुहैया कराई जाती है। बाकी पैसा सब्सिडी के रूप में सरकार देती है।

कर्मचारियों को भी लग रही चपत
बाईफर के निर्देशानुसार प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच हुए समझौते में वर्ष 2005 तक के बकाए का भुगतान कर्मचारियों को दिया जा चुका है। इसके बाद वर्ष 2010 तक का भुगतान छह किश्तों में छह महीने तक दिया जाना है। मगर शर्त के हिसाब से यह प्लांट के एक वर्ष तक सफलतापूर्वक चलने के बाद ही यह अदा किया जाएगा। अब प्लांट न चलने की दशा में ड्यूज भी नहीं दिए जा सकते हैं।


अनिश्चितता को देख नौकरी छोड़ी
बीते एक साल के भीतर प्लांट में लगभग 125 नए इंजीनियरों को नियुक्ति दी गई है। सूत्रों की मानें, तो यहां के लगभग 30 लोग नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह प्लांट के चलने में अनिश्चितता है। नई भर्ती में आए इंजीनियर अपने करियर पर संकट देख यह कदम उठा रहे हैं। वहीं एग्रीमेंट के तहत सभी कर्मचारियों को फिक्स सेलरी ही मिल रही है। अन्य लाभ तभी मिलेंगे, जब प्लांट से उत्पादन शुरू होगा।

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