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'अंतरराष्ट्रीय पूंजी को खुश करने वाला होगा बजट'
सीताराम येचुरी
Updated Mon, 25 Feb 2013 07:30 PM IST
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केंद्र के सालाना बजट (2013-14) को लेकर गहमा-गहमी तेज हो गई है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से जनता के अलग-अलग वर्गों-तबकों की अपनी-अपनी इच्छा सूचियां (विश लिस्ट) सामने आ रही हैं। इस बार का बजट हमारे देश में खराब आर्थिक वृद्धि दर की पृष्ठभूमि में पेश किया जा रहा है।
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अब हम जिस वित्त वर्ष के अंत के करीब पहुंच चुके हैं, उसकी सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6 फीसदी के करीब भी नहीं पहुंच पाएगी। इसके चलते अर्थव्यवस्था की गति में बहुत भारी कमी आई है। जाहिर है कि इसके साथ ही बेरोजगारी में बढ़ोतरी तथा आय के स्तरों में गिरावट जैसे दुष्परिणाम भी जुड़े हुए हैं।
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इसके ऊपर से सभी आवश्यक वस्तुओं और खासतौर पर खाने-पीने की चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहने के चलते, जनता की वास्तविक आमदनियों में गिरावट जारी रही है। इन सच्चाइयों पर आधारित जनता की इच्छा सूचियां सामने हैं।
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आज सामने आ रही इच्छा सूचियों में, सबसे ताकतवर तो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की मांगों की ही सूची नजर आ रही है। यह वित्तीय पूंजी नवउदारीकरण का इंजन बनी हुई है। संक्षेप में यह भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजों को धक्का देकर और खुलवाते हुए अपने मुनाफों को और अधिकतम स्तर पर पहुंचाने की इच्छा की सूची है।
यूपीए-2 के इसी बजट से जुड़ी प्रत्याशाओं के बल पर सेंसेक्स 20 हजार अंक का स्तर करीब-करीब पार ही कर चुका है। जाहिर है कि इस आशावाद को इस तथ्य से सहारा मिल रहा है कि यह सरकार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा भारतीय बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए बिछ जाती है।
भारी विरोध के बावजूद, खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को तो पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाने की तैयारियां चल रही हैं। आम (कर) वंचना विरोधी नियम या गार (जनरल एंटी-अवायडेंस रूल्स) को अब दो वर्ष आगे खिसका दिया गया है। यह व्यवस्था पिछले बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री तथा वर्तमान राष्ट्रपति ने ही पेश की थी।
इस व्यवस्था के दो साल के लिए टाले जाने से विदेशी निवेशकों ने और खासतौर पर उन निवेशकों ने भारी राहत महसूस की है, जो हमारे देश में होने वाली अपनी कमाई पर कोई भी कर अदा करने से बचने के लिए मॉरीशस रूट का इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नहीं, गार में इस आशय का बदलाव और कर दिया गया है कि 2016-17 में उसके लागू होने के बाद भी, 3 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाने वालों को ही इसके तहत कोई कर देने की जरूरत होगी, दूसरों को नहीं। पुन: गार के उपबंध अनिवासी विदेशी संस्थागत निवेशकों पर लागू नहीं होंगे और उन निवेशकों पर भी लागू नहीं होंगे जो दोहरे काराधान के निवारण की किसी भी संधि के तहत कोई लाभ ही नहीं ले रहे हों।
यह कदम हमारे देश में सट्टेबाजी की पूंजी के प्रवाहों में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी की इजाजत देने का ही काम करेगा। नए संशोधनों में ऐसे निवेशकों को मुनाफों पर किसी भी तरह का कर देने से बरी ही कर दिया गया है, जो पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी-नोट्स) के माध्यम से शेयर बाजारों में निवेश करते हैं।
सभी को पता है कि पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए निवेश का रास्ता, जिसमें व्यक्तियों या कंपनियों को अपनी पहचान उजागर करनी ही नहीं होती है, बड़े पैमाने पर अवैध धन को व्हाइट करने और कर चोरी का स्रोत बना रहा है। बजट से पहले ही ये तमाम घोषणाएं कर वित्त मंत्री ने नवउदारवादी सुधारों के उसी रास्ते को और मजबूत करने का इशारा किया है, जो हमारे एक देश के ही भीतर बन गए दो देशों ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच की खाई को और चौड़ा ही करने जा रहा है। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर हमें बजट में ऐसे ही और भी प्रस्ताव देखने को मिलें, जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को और भी खुश करने वाले होंगे।
इन तमाम कदमों की हिमायत में यूपीए सरकार की दलीलें, इस भ्रामक समझ पर ही आधारित हैं कि इनके चलते विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे निवेश के लिए फंडों की उपलब्धता बढ़ेगी और इससे वृद्धि दर बढ़ेगी तथा आमतौर पर हमारी जनता के लिए खुशहाली आएगी।
इसके विपरीत, सचाई यह है कि विदेशी पूंजी का बढ़ा हुआ प्रवाह, ऐसी परिस्थितियों में जहां विश्व स्तर पर मंदी चल रही है तथा विकसित देशों में मुनाफे अधिकतम करने के मौके बहुत ही कम रह गए हैं, हमारे यहां इस पूंजी के लिए मुनाफे अधिकतम करने के ही मौके बढ़ा रहा होगा, न कि हमारे यहां घरेलू निवेश के लिए अतिरिक्त फंड मुहैया करा रहा होगा।
इतना ही नहीं, अगर यह मान भी लिया जाए कि इस तरह निवेश के लिए अतिरिक्त फंड मुहैया भी कराए जा रहे होंगे, तब भी इनके आधार पर अतिरिक्त निवेश के जरिए उच्चतर वृद्धि दर का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकेगा, जब इस तरह के निवेश के बल पर होने वाले अतिरिक्त उत्पादन को जनता अपने उपभोग के लिए खरीदने में समर्थ हो। मौजूदा हालात में जब भारतीय जनता के हाथों में क्रय शक्ति गिरावट पर ही है, इस तरह की वृद्धि दर की उम्मीद करना, मुगालते में रहना ही कहा जाएगा।
इस तरह यह रणनीति जनता के विशाल बहुमत पर और ज्यादा आर्थिक बोझ लादने के जरिए, जो पहले ही संपन्न हैं उनके मुनाफे और बढ़ाने के सिवा दूसरा कोई काम नहीं कर सकती है। इससे बचने के लिए सरकार की नीतिगत दिशा में भारी बदलाव लाना होगा। ऐसा बदलाव सिर्फ तभी आ सकता है, जब जनता की गोलबंदी के जरिए सरकार पर बहुत भारी दबाव डाला जाए।