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स्वचालित मशीनों से मिलेगा ईंट उद्योग का दम

Wed, 12 Sep 2012 12:19 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 12 Sep 2012 12:19 PM IST
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brick industry will empowered by automatic machines
अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रदाताओं और उत्पादकों के देश में प्रवेश से भारतीय ईंट निर्माता, विशेषकर लघु और मझोले उद्यमी (एसएमई) नई तकनीक अपनाकर बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। उद्यमी अपने उत्पाद में भी नयापन ला रहे हैं। फिलहाल देशभर में अर्ध-स्वचालित और पूर्ण-स्वचालित भट्ठों समेत करीब 35 ऐसे संयत्र चालू हैं। बहुत से अन्य आधुनिक संयंत्र निर्माणाधीन हैं।
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विश्लेषकों का मानना है कि श्रम के प्रबंधन से संबंधित कठिनाइयों, गुणवत्ता बरकरार रखने और अच्छी गुणवत्ता वाली ईंटों की बढ़ती मांग ने भट्ठा उद्यमियों को अपनी उत्पादन प्रक्रिया के बारे में पुनर्विचार करने और उत्पाद में नयापन लाने के लिए बाध्य किया है। इसके कारण बहुत से उद्यमी विदेशों से मशीनरी आयात कर संसाधनों की बचत करने वाली ईंटों (आरईबी) का निर्माण कर रहे हैं। इन ईंटों में या तो छेद होता है या यह खोखली होती हैं, लेकिन इनकी प्रतिरोध क्षमता काफी अधिक होती है। साथ ही इनके उत्पादन में कम ऊर्जा और संसाधनों की जरूरत होती है।
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यूरोप में आरईबी का काफी चलन है, लेकिन भारत में इनकी शुरुआत ही हुई है। हालांकि यहां इनका बाजार बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत के कुल ईंट उत्पादन में इनका हिस्सा एक फीसदी से भी कम है। भारत में अगर इनका चलन बढ़ा तो उर्वरक मिट्टी के उपयोग में 20 फीसदी और ऊर्जा की खपत में 20-30 फीसदी कमी संभव हो सकेगी। इसके शुरुआती अनुभव से उत्साहित उद्यमी आरईबी और परंपरागत ईंटों के निर्माण के लिए उन्नत स्वचालित मशीनें चीन और जर्मनी से आयात कर रहे हैं। वहीं, मशीनरी और आरईबी संयंत्र स्थापित करने के लिए बहुत से उद्यमी इस क्षेत्र की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। फिलहाल इस तरह के 12 संयंत्र दक्षिणी क्षेत्र में, चार पश्चिम में और दो पूर्वी क्षेत्र में हैं।
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फिलहाल भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में संभावनाओं को देखते हुए यूरोप के प्रमुख मशीन विनिर्माताओं ने भारतीय मशीनरी विनिर्माताओं के साथ समझौते कर देश में कारोबार शुरू किया है। बेंगलुरु में विएनरबर्जर जैसे बहुराष्ट्रीय ईंट निर्माताओं के आगमन ने ईंट उद्यमियों को नई मशीनें और आरईबी के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया है। भारत में हर साल करीब 140 अरब ईंटों का उत्पादन होता है, लेकिन ज्यादातर उत्पादन परंपरागत उत्पादन प्रक्रिया से होता है। इस उद्योग में हर साल करीब 240 लाख टन कोयले की खपत होती है और मिट्टी से बनने वाली ईंटों के लिए हर साल 35 करोड़ टन ऊपरी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। उद्योग का कार्बन (सीओ2) उत्सर्जन 420 लाख टन प्रतिवर्ष अनुमानित है।


द एनर्जी ऐंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) कम ऊर्जा की खपत वाली तकनीकों को प्रोत्साहित कर ऊर्जा की मितव्ययिता सुधारने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में काम कर रहा है। भारतीय ईंट उद्योग में ईंधन की मितव्ययिता के लिए यह केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय के साथ मिलकर एक परियोजना पर काम कर रहा है। इस परियोजना की कार्यकारी एजेंसी संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) है। आरईबी तकनीक के प्रदर्शन, तकनीकी मॉडल विकसित करने और विभिन्न क्षेत्रों और ईंट क्लस्टरों तक पहुंचने के लिए इस परियोजना के तहत उत्तर, पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर-पूर्व में स्थानीय संसाधन केंद्र (एलआरसी) स्थापित किए जा रहे हैं। पंजाब स्टेट काउंसिल फॉर साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी उत्तरी क्षेत्र के लिए एलआरसी है।
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