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रुपये की कमजोरी ने लगाए साइकिल उद्योग में पहिए
लुधियाना/राजीव शर्मा
Updated Wed, 12 Jun 2013 10:02 PM IST
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डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही कमजोरी घरेलू साइकिल उद्योग के लिए वरदान साबित हो रही है।
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करेंसी के कारण बदली परिस्थितियों में अब आयातित साइकिल एवं पार्ट्स दस फीसदी तक महंगे हो गए हैं, इससे घरेलू इंडस्ट्री को विदेशी चुनौती से राहत मिल रही है।
दूसरे, रुपये में गिरावट से निर्यातक विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धी हो रहे हैं। इससे निर्यात में 200 करोड़ रुपये के उछाल का अनुमान लगाया जा रहा है।
पिछले साल साइकिल एवं पार्ट्स का करीब 950 करोड़ रुपये का आयात चीन और अन्य देशों से किया गया था। आयातित साइकिल पर 45 फीसदी और पार्ट्स पर 25.42 फीसदी ड्यूटी लग रही हैं। लेकिन सार्क एवं साफ्टा देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते के चलते मलयेशिया, श्रीलंका, बांग्लादेश इत्यादि देशों से साइकिल एवं पार्ट्स के आयात पर केवल 8.8 फीसदी ड्यूटी लग रही है।
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पिछले साल सरकार ने जब साइकिल एवं पार्ट्स का आयात रोकने को ड्यूटी बढ़ाई तो आयातकों ने सार्क एवं साफ्टा देशों के रूट से कम ड्यूटी पर आयात शुरू कर दिया, लेकिन अब रुपये की मार सभी पर पड़ रही है।
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करेंसी में गिरावट से 30 डॉलर कीमत वाली साइकिल 225 रुपये और 100 डालर वाली साइकिल 725 रुपये महंगी हो गई है। चीन समेत विदेशों से साइकिल के अलावा स्पोक, माडर्न ब्रेक, डिस्क ब्रेक, गियर सिस्टम, सेडल, अल्यूमिनियम पार्ट्स का आयात किया जा रहा है।
करेंसी की उठापठक में साइकिल पार्ट्स भी दस फीसदी तक महंगे हो गए हैं। इससे विदेशी आयात कम हो रहा है और इंडस्ट्री में विदेशी चुनौती अब कम हो रही है। नतीजतन आयात में इस साल 15-20 फीसदी की कमी आ सकती है।
निर्यात में बढ़ोतरी की संभावनाएं जताते हुए साइकिल उद्यमियों का कहना है कि हब का रेट 57 रुपये पड़ता है। अब इसका भी आसानी से निर्यात किया जा सकता है। इसी तरह चेन व्हील, फ्री व्हील, फ्रेम, टायर, रिम का भी निर्यात संभव हो पाया है।
संभावनाओं को कैश करने में जुटी इंडस्ट्री
इंडियन बाइसाइकिल मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट सतीश ढांडा का कहना है कि चीन की करेंसी साल-दर-साल तीन से चार फीसदी मजबूत हो रही है। जबकि भारतीय करेंसी कमजोर हो रही है। इस वजह से अब चीन के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो रहा है।
इस अवसर को भारतीय साइकिल उद्योग भुनाने में लगा है। आयात में कमी आने से यहां का मैन्यूफैक्चरिंग बेस मजबूत होगा, जबकि निर्यात बढ़ने से इंडस्ट्री में नई जान आएगी। साइकिल उद्योग का निर्यात विदेशी चुनौतियों के चलते पिछले कई सालों से बढ़ नहीं पा रहा है और सात-आठ सौ करोड़ के बीच में ही झूल रहा है।
अब मौजूदा हालात में इसमें दो सौ करोड़ के उछाल का अनुमान है। ढांडा यह भी मानते हैं कि रुपये में गिरावट से कुछ आयातित पुर्जे महंगे साबित हो रहे हैं। इसका असर हाई-एंड साइकिल की लागत पर भी आ रहा है बावजूद इसके कुल मिला कर उद्योग कंफर्ट जोन में है।