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पुराने आंकड़ों पर फिच की कार्रवाई: प्रणब
Market
Updated Tue, 19 Jun 2012 12:00 PM IST
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फिच द्वारा भारत के क्रेडिट आउटलुक को निगेटिव किए जाने को खारिज करते हुए वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि रेटिंग एजेंसी की यह कार्रवाई पुराने आंकड़ों पर आधारित है। फिच ने हाल के सकारात्मक रुझानों को दरकिनार किया है।
मुखर्जी ने कहा कि बाजार में इसको लेकर पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि फिच देश के क्रेडिट आउटलुक में संशोधन करेगी। इसलिए यह घोषणा चौंकाने वाली नहीं है। यह खासतौर से ध्यान देने वाली बात है कि फिच ने पुराने आंकड़ों के आधार पर ही यह कार्रवाई की है।
एजेंसी ने हाल के दिनों में अर्थव्यवस्था में आए सकारात्मक रुझानों की पूरी तरह अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि फिच ने हाल में सरकार द्वारा किए गए तमाम उपायों को संज्ञान में नहीं लिया। इनमें खाद सब्सिडी सुधार, सब्सिडी को जीडीपी के एक निश्चित दायरे में लाने की पहल, नई विनिर्माण एवं टेलीकॉम पॉलिसी आदि शामिल है।
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रेटिंग एजेंसी ने अपनी कार्रवाई में भारत में पब्लिक फाइनेंस को मजबूत करने की प्रक्रिया की भी अनदेखी की। पिछले कुछ सालों में देश में सरकारी कर्ज और जीडीपी अनुपात में धीरे-धीरे कमी आई है। जबकि, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात तेजी से बढ़ा है।
मुखर्जी का कहना है कि रेटिंग एजेंसी द्वारा आर्थिक विकास की क्षमता, मुद्रास्फीतिक दबाव और कमजोर पब्लिक फाइनेंस पर गहरी चिंता जताई है। जबकि, सरकार ने इन बातों पर पहले ही खास ध्यान दिया है।
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मुखर्जी ने कहा कि बाजार में इसको लेकर पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि फिच देश के क्रेडिट आउटलुक में संशोधन करेगी। इसलिए यह घोषणा चौंकाने वाली नहीं है। यह खासतौर से ध्यान देने वाली बात है कि फिच ने पुराने आंकड़ों के आधार पर ही यह कार्रवाई की है।
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एजेंसी ने हाल के दिनों में अर्थव्यवस्था में आए सकारात्मक रुझानों की पूरी तरह अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि फिच ने हाल में सरकार द्वारा किए गए तमाम उपायों को संज्ञान में नहीं लिया। इनमें खाद सब्सिडी सुधार, सब्सिडी को जीडीपी के एक निश्चित दायरे में लाने की पहल, नई विनिर्माण एवं टेलीकॉम पॉलिसी आदि शामिल है।
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रेटिंग एजेंसी ने अपनी कार्रवाई में भारत में पब्लिक फाइनेंस को मजबूत करने की प्रक्रिया की भी अनदेखी की। पिछले कुछ सालों में देश में सरकारी कर्ज और जीडीपी अनुपात में धीरे-धीरे कमी आई है। जबकि, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात तेजी से बढ़ा है।
मुखर्जी का कहना है कि रेटिंग एजेंसी द्वारा आर्थिक विकास की क्षमता, मुद्रास्फीतिक दबाव और कमजोर पब्लिक फाइनेंस पर गहरी चिंता जताई है। जबकि, सरकार ने इन बातों पर पहले ही खास ध्यान दिया है।