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सरकारी मदद के अभाव में बढ़े पेट्रोल के दाम
Market
Updated Fri, 25 May 2012 12:00 PM IST
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पेट्रोल मूल्य वृद्धि पर मचे सियासी घमासान को थामने के लिए अब तेल कंपनियों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। सरकार के बचाव में उतरी तेल कंपनियों ने दाम में बढ़ोतरी पर सफाई देते हुए कहा है कि सरकारी नियंत्रण से मुक्त उत्पाद होने के कारण पेट्रोल बिक्री पर होने वाले नुकसान की भरपाई केंद्र की ओर से नहीं की जाती है।
जबकि देश में ईंधन आपूर्ति के लिए 80 फीसदी तक आयात पर निर्भरता होने के कारण उन्हें अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उछाल से काफी नुकसान झेलना पड़ा है। इसलिए उनके लिए दाम बढ़ाना जरूरी हो चुका था। हालांकि कच्चे तेल की कीमत घटने पर पेट्रोल की कीमतें घटाने पर निर्णय किया जा सकता है।
तेल कंपनियों ने कहा है कि घरेलू बाजार की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण पिछले छह माह में कीमतें नहीं बढ़ाई गई। मगर सरकार की ओर से इस एवज में कोई सहायता नहीं मिली। ऐसी स्थिति में कीमत बढ़ाने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं रह गया था।
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हालांकि इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन आरएस बुटोला ने यह भरोसा दिलाया है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटती है, तो पेट्रोल के दाम घटाया जा सकता है। लेकिन तत्काल हुई मूल्यवृद्धि को अभी वापस नहीं लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जून की शुरुआत में कीमतों की फिर से समीक्षा की जाएगी। संभव है कि उस वक्त कीमतों में आंशिक कटौती पर कोई निर्णय किया जा सके।
थोड़ी हकीकत, ज्यादा फसाना
--पेट्रोल की कीमत को 24 जून 2010 को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया।
--भारतीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में पीएसयू के अधिकांश शेयर केंद्र सरकार के पास हैं। कोई भी तेल कंपनी सरकार की हरी झंडी के बगैर कीमत में घट-बढ़ नहीं कर सकती।
--क्रूड ऑयल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ोतरी से कंपनियों को घाटा होता है।
--ऑयल कंपनियों के बैलेंस शीट को देख लीजिए हर साल लाभ बढ़ता ही नजर आएगा। तेल की कीमत में अंतर की भरपाई सरकार करती है।
--बार-बार बढ़ती हैं पेट्रोल की कीमतें, डीजल के दाम जल्दी नहीं बढ़ते। अधिकांश देशों में पेट्रोल और डीजल बिकते हैं एकभाव।
--पेट्रोल को सरकार शहरी उपभोग की वस्तु मानती है और यह मानकर चलती है शहरी लोग लंबा आंदोलन नहीं कर सकते। डीजल को सरकार किसानों यानी मतदाताओं के सबसे बड़े समूह की जरूरत मानती है।
--डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट से कंपनियों को आयात के लिए डॉलर लेने में अधिक रुपये खर्च करने होते हैं। इससे कच्चा तेल महंगा आयात होता है।
--हाल के दिनों में रुपये की कीमत में करीब 20-22 फीसदी की गिरावट आई, जबकि कच्चा तेल अपने उच्चतम से 30 फीसदी नीचे के स्तर पर चल रहा है।
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जबकि देश में ईंधन आपूर्ति के लिए 80 फीसदी तक आयात पर निर्भरता होने के कारण उन्हें अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उछाल से काफी नुकसान झेलना पड़ा है। इसलिए उनके लिए दाम बढ़ाना जरूरी हो चुका था। हालांकि कच्चे तेल की कीमत घटने पर पेट्रोल की कीमतें घटाने पर निर्णय किया जा सकता है।
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तेल कंपनियों ने कहा है कि घरेलू बाजार की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण पिछले छह माह में कीमतें नहीं बढ़ाई गई। मगर सरकार की ओर से इस एवज में कोई सहायता नहीं मिली। ऐसी स्थिति में कीमत बढ़ाने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं रह गया था।
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हालांकि इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन आरएस बुटोला ने यह भरोसा दिलाया है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटती है, तो पेट्रोल के दाम घटाया जा सकता है। लेकिन तत्काल हुई मूल्यवृद्धि को अभी वापस नहीं लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जून की शुरुआत में कीमतों की फिर से समीक्षा की जाएगी। संभव है कि उस वक्त कीमतों में आंशिक कटौती पर कोई निर्णय किया जा सके।
थोड़ी हकीकत, ज्यादा फसाना
--पेट्रोल की कीमत को 24 जून 2010 को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया।
--भारतीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में पीएसयू के अधिकांश शेयर केंद्र सरकार के पास हैं। कोई भी तेल कंपनी सरकार की हरी झंडी के बगैर कीमत में घट-बढ़ नहीं कर सकती।
--क्रूड ऑयल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ोतरी से कंपनियों को घाटा होता है।
--ऑयल कंपनियों के बैलेंस शीट को देख लीजिए हर साल लाभ बढ़ता ही नजर आएगा। तेल की कीमत में अंतर की भरपाई सरकार करती है।
--बार-बार बढ़ती हैं पेट्रोल की कीमतें, डीजल के दाम जल्दी नहीं बढ़ते। अधिकांश देशों में पेट्रोल और डीजल बिकते हैं एकभाव।
--पेट्रोल को सरकार शहरी उपभोग की वस्तु मानती है और यह मानकर चलती है शहरी लोग लंबा आंदोलन नहीं कर सकते। डीजल को सरकार किसानों यानी मतदाताओं के सबसे बड़े समूह की जरूरत मानती है।
--डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट से कंपनियों को आयात के लिए डॉलर लेने में अधिक रुपये खर्च करने होते हैं। इससे कच्चा तेल महंगा आयात होता है।
--हाल के दिनों में रुपये की कीमत में करीब 20-22 फीसदी की गिरावट आई, जबकि कच्चा तेल अपने उच्चतम से 30 फीसदी नीचे के स्तर पर चल रहा है।