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बाजार को मजबूत आधार दे गया 2012
नई दिल्ली/कारोबार डेस्क
Updated Tue, 25 Dec 2012 03:17 PM IST
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देश के लिए अर्थव्यवस्था के लिहाज से 2012 चाहे जैसा भी रहा, विकास दर में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, राजकोषीय घाटा भी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, लेकिन शेयर बाजार के हिसाब से देखें तो 2012 न सिर्फ बाजार को मजबूती दे गया, साथ ही 2013 के लिए एक मजबूत आधार भी दे गया।
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बीते कुछ महीनों में शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा लौटा। सेंसेक्स 19,600 के स्तर तक गया। हालांकि अपने रिकॉर्ड ऊंचाई को नहीं छू पाया है। अभी भी यह अपने रिकार्ड ऊंचाई से करीब आठ फीसदी नीचे है। लेकिन बाजार के देखने का यह नजरिया नकारात्मक होगा।
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सकारात्मक बात यह है कि 2012 में सेंसेक्स में अभी तक करीब 23 फीसदी की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई। निवेश के किसी भी तरीके में साल में 23 फीसदी का रिटर्न पाना काफी कठिन है। इस शानदार रिटर्न से आगे की बात यह है कि बाजार में घरेलू के साथ-साथ विदेशी निवेशकों का भरोसा लौट रहा है।
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बीते सितंबर से निवेशकों के भरोसे में अच्छी बढ़ोतरी रही और इस दौरान करीब 13 फीसदी की बढ़ोतरी रही। विदेशी उभरते बाजारों से तुलना करें तो भी हमारा विकास उनके नौ फीसदी की तुलना में काफी ऊंचा रहा। देश के शेयर बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 20 अरब डॉलर लगाए।
आर्थिक सुधारों को लेकर देश में सरकार जिस तरह तेजी अपना रही है उसमें आने वाले समय में निवेशकों का भरोसा और भी बढ़ेगा। 2013 में बाजार में तेज विदेशी निवेश का आकलन है। इन सभी के बीच 2013 के कुछ महीनों में ही सेंसेक्स अगर नई ऊंचाई को छू ले तो कोई आश्चर्य नहीं।
बीते कुछ समय में सरकार के सुधारवादी कदमों के प्रति बाजार का भरोसा बढ़ा है। बीते संसद सत्र में भी बैंकिंग और कंपनी बिल के सदन में पारित होने से बाजार का भरोसा लौटा है। आने वाले समय में जीएसटी, डीटीसी, बीमा आदि पर भी सरकार के कदम बढ़ सकते हैं।
इन सभी कदमों ने विदेशी निवेशकों का भरोसा जीता है। महंगाई के मुद्दे पर जिस तरह के आकलन सामने आ रहे हैं उनसे समझा जा रहा है कि आने वाले समय में महंगाई के आंकड़े में कुछ राहत मिले जिससे रिजर्व बैंक भी ब्याज दरों में कुछ कमी की घोषणा करे।
इस तरह के सिग्नल आरबीआई ने भी दिया है? जाहिर से बात है कि ब्याज दरों में कटौती का सीधा असर होगा बाजार में नकदी का उठाव। व्यक्तिगत ऋण में बढ़ोतरी से मांग बढ़ेगी और मांग को पूरा करने में कॉरपोरेट अपनी परियोजनाओं के लिए कर्ज लेंगे।
यह सभी बातें विकास के चक्र से जुड़ी हैं। विकास का अगर यह चक्र चल पड़ा तो शेयर बाजार की तेजी को कौन रोक सकेगा, लेकिन सबकुछ इतना सीधा और आसान भी नहीं है।
विदेशी फ्रंट पर बड़ी चुनौतियां हैं। यूरोप के पूरे 2013 में मंदी में फंसे रहने का अकलन दुनियाभर की विशेषज्ञ एजेंसियां कर रही है। अमेरिका में भी वित्तीय सख्ती की बात है। इन सभी का परोक्ष असर भारत के अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। सबसे अधिक मार निर्यात पर ही पड़ने वाली है।