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पारा -50 डिग्री, कब्र खोदने में लगते हैं 4 दिन
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Thu, 24 Jan 2013 09:24 AM IST
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कल्पना कीजिए इतनी ठंड की, जहां पेन की स्याही जम जाए, बेटरी डिस्चार्ज हो जाए, कार स्टार्ट न हो और चेहरे पर चश्मा भी जम जाए। आप तो सोच कर ही ठिठुर जाएंगे लेकिन ऐसे हालातों में लोग मजे से रहते हैं। जी हां बात हो रही है धरती के सबसे ठंडे गांव की जहां सामान्य पारा -50 डिग्री रहता है।
डेली मेल के अनुसार रूस के ओयमायकोन प्रांत के याकुटस्क गांव को 'पोल ऑफ कोल्ड' भी कहा जाता है। 1924 में यहां का न्यूनतम तापमान दिसंबर-जनवरी माह में -71 तक पहुंच गया था। जनवरी माह में यहां का तापमान औसतन -50 डिग्री रहता है और जुलाई अगस्त में तापमान -30 डिग्री रहता है। यहां बारह महीने कई इंच मोटी बर्फ जमी रहती है और इसी कारण यहां मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता।
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याकुटस्क गांव के लोगों को बर्फ और सर्दी से तो कोई परेशान नहीं लेकिन गांव वाले अपने वाहनों को 24 घंटे चलाए रखने को मजबूर हैं। इस डर से कि एक बार बंद हुए तो स्टार्ट नहीं हो पाएंगे। यहां पेन की स्याही जमी रहती है, चश्मे चेहरे पर ही जम जाते हैं। इस गांव की ऊंचाई समुद्र तल से 750 मीटर पर है और यही कारण है यहां दिसंबर के दिन गर्मियों के दिनों की तुलना में तीन घंटे छोटे होते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इस गांव के बगल में ही गर्म पानी का झरना है। कहा जाता है कि गांव तब बसा जब रेंडियर चराने वाले चरवाहे अपने जानवरों को इस झरने का पानी पिलाने के लिए यहां रुकते थे। इसी के चलते गांव बस गया।
यहां कब्र खोदने के लिए तीन से चार दिन लग जाते हैं। इसका कारण भी अजीब है। यहां जमीन इतनी सख्त है कि खोदने के लिए काफी समय चाहिए। जमीन को नर्म करने के लिए वहां आग जलाई जाती है। कोयले को वहां तीन चार दिन तक जलाए रखना पड़ता है ताकि जमीन नर्म रहे और वहां खुदाई होती रहती है। ये काम तीन से चार दिन में हो पाता है और तब जाकर ताबूत को दफनाया जा सकता है।
इस गांव में आधुनिक टेक्नालजी काम नहीं करती। मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता। यहां के लोग अभी भी कोयला और लकड़ी को ही ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यहां वाहनों की लाइटें दिन भर चालू रहती है। गांव में एक ही दुकान है। गांव के बाहर एक ही पेट्रोल पंप है जिससे गांव के लोग अपने वाहनों के लिए पेट्रोल भरवाते हैं।
इस बर्फीले गांव में किसी भी तरह के अन्न की खेती संभव नहीं और यही कारण है कि गांववाले रेंडियर और घोड़े का मीट खाकर गुजरबसर करते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि चूंकि ये लोग जानवरों का दूध भी पीते हैं और इसी कारण अन्न के अभाव के बावजूद इनको कुपोषण नहीं होता।
गांव का स्कूल न्यूमतम तापमान के -52 डिग्री होने पर ही बंद किया जाता है। लेकिन इन हालातों में भी गांव के लोग अपनी सभ्यता और संस्कृति को नजरंदाज नहीं करते। यहां अभी भी टायलेट घरों के बाहर ही बनाए जाते हैं।
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डेली मेल के अनुसार रूस के ओयमायकोन प्रांत के याकुटस्क गांव को 'पोल ऑफ कोल्ड' भी कहा जाता है। 1924 में यहां का न्यूनतम तापमान दिसंबर-जनवरी माह में -71 तक पहुंच गया था। जनवरी माह में यहां का तापमान औसतन -50 डिग्री रहता है और जुलाई अगस्त में तापमान -30 डिग्री रहता है। यहां बारह महीने कई इंच मोटी बर्फ जमी रहती है और इसी कारण यहां मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता।
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याकुटस्क गांव के लोगों को बर्फ और सर्दी से तो कोई परेशान नहीं लेकिन गांव वाले अपने वाहनों को 24 घंटे चलाए रखने को मजबूर हैं। इस डर से कि एक बार बंद हुए तो स्टार्ट नहीं हो पाएंगे। यहां पेन की स्याही जमी रहती है, चश्मे चेहरे पर ही जम जाते हैं। इस गांव की ऊंचाई समुद्र तल से 750 मीटर पर है और यही कारण है यहां दिसंबर के दिन गर्मियों के दिनों की तुलना में तीन घंटे छोटे होते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इस गांव के बगल में ही गर्म पानी का झरना है। कहा जाता है कि गांव तब बसा जब रेंडियर चराने वाले चरवाहे अपने जानवरों को इस झरने का पानी पिलाने के लिए यहां रुकते थे। इसी के चलते गांव बस गया।
यहां कब्र खोदने के लिए तीन से चार दिन लग जाते हैं। इसका कारण भी अजीब है। यहां जमीन इतनी सख्त है कि खोदने के लिए काफी समय चाहिए। जमीन को नर्म करने के लिए वहां आग जलाई जाती है। कोयले को वहां तीन चार दिन तक जलाए रखना पड़ता है ताकि जमीन नर्म रहे और वहां खुदाई होती रहती है। ये काम तीन से चार दिन में हो पाता है और तब जाकर ताबूत को दफनाया जा सकता है।
इस गांव में आधुनिक टेक्नालजी काम नहीं करती। मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता। यहां के लोग अभी भी कोयला और लकड़ी को ही ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यहां वाहनों की लाइटें दिन भर चालू रहती है। गांव में एक ही दुकान है। गांव के बाहर एक ही पेट्रोल पंप है जिससे गांव के लोग अपने वाहनों के लिए पेट्रोल भरवाते हैं।
इस बर्फीले गांव में किसी भी तरह के अन्न की खेती संभव नहीं और यही कारण है कि गांववाले रेंडियर और घोड़े का मीट खाकर गुजरबसर करते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि चूंकि ये लोग जानवरों का दूध भी पीते हैं और इसी कारण अन्न के अभाव के बावजूद इनको कुपोषण नहीं होता।
गांव का स्कूल न्यूमतम तापमान के -52 डिग्री होने पर ही बंद किया जाता है। लेकिन इन हालातों में भी गांव के लोग अपनी सभ्यता और संस्कृति को नजरंदाज नहीं करते। यहां अभी भी टायलेट घरों के बाहर ही बनाए जाते हैं।