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इस अस्पताल में होता है 'बीमार कलमों' का इलाज

Thu, 12 Dec 2013 02:04 PM IST
Updated Thu, 12 Dec 2013 02:04 PM IST
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इंसानों और जानवरों के अस्पताल के बारे में तो सब जानते हैं। लेकिन क्या स्याही वाली कलम(फाउंटनपेन) का भी कोई अस्पताल हो सकता है? इसका जवाब है- हां।

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लेकिन इसे देखने के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता आना होगा।

कोलकाता के व्यस्ततम इलाके धर्मतल्ला में मेट्रो रेलवे के चार नंबर गेट से बाहर निकलते ही एक पतली-सी गली में स्थित यह अस्पताल दरअसल है तो एक छोटी-सी पुरानी दुकान, लेकिन यहां दुनिया भर के दुर्लभ और बेशकीमती कलमों का संग्रह है।
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इस दुकान के मालिक मोहम्मद रियाज़ का दावा है कि यह पूर्वी भारत ही नहीं, बल्कि पूरे देश में किसी भी किस्म की कलम की मरम्मत का अनोखा केंद्र है।

नब्बे साल पहले रियाज़ के दादा ने इस दुकान की शुरुआत की थी। तब ब्रिटिश शासन का दौर था और फाउंटनपेन सबके जीवन का अनिवार्य हिस्सा था।

उसके बाद रियाज़ के पिता ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अब रियाज़ अपने बड़े भाई इम्तियाज़ के साथ इसे संभाल रहे हैं।

रियाज़ के दो बेटे भी अगले दो-तीन साल में इस अस्पताल का कार्यभार संभाल लेंगे।

पार्कर से लेकर मौंग ब्लौंग और शेफर्स तक, कलम चाहे दुनिया के किसी भी कोने में बनी हो और कितनी भी महंगी क्यों न हो, रियाज़ उन सबकी मरम्मत का दावा करते हैं।
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कलम की बीमारी
लेकिन इस दुकान का नाम ‘पेन हास्पीटल’ या कलमों का अस्पताल क्यों रखा गया था?

इस सवाल पर रियाज़ कहते हैं, "देश-विदेश की तमाम बेशकीमती कलमें मिल तो कहीं भी जाती हैं। लेकिन पूरे देश में कहीं भी उनकी मरम्मत नहीं होती। हम लोग निब वाली हर कलम की मरम्मत करते हैं। इसलिए दादा जी ने इसका नाम ही अस्पताल रख दिया। यहां कलम की हर बीमारी का शर्तिया इलाज किया जाता है।"

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पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान बॉल पेन और जेल पेन का प्रचलन बढ़ा है। इससे उनके अस्पताल के कारोबार पर कितना असर पड़ा है।

रियाज़ कहते हैं, "अब भी बहुत लोग फाउंटनपेन का इस्तेमाल करते हैं। ख़रीदारों की भी कोई कमी नहीं है। कलम ख़राब हो जाने पर उसकी मरम्मत के लिए हमारे अस्पताल में ही पहुंचते हैं।"

इस संवाददाता के साथ बातचीत के दौरान ही वहां एक ग्राहक दो बेशकीमती मौंग ब्लौंग कलमों के साथ पहुंचे। उन्होंने दोनों कलमों को किसी और दुकान पर मरम्मत के लिए दिया था।

रियाज़ उनको समझाते हैं कि इस कलम की निब को बाहर निकालने का भी ख़ास तरीका है। सीधी तरह निकालने पर वह टेढ़ी हो जाती है। रियाज़ बताते हैं, "दूसरी दुकान में मरम्मत करने की बजाय निब को और टेढ़ा कर दिया गया है। इससे वह नहीं चल रही।"

ग्राहक को अगले सप्ताह आने की बात कह कर वह दोनों कलमों के पूरी तरह ठीक हो जाने का भरोसा देते हैं।

लिखावट पर असर
रियाज़ कहते हैं कि फाउंटनपेन से हाथों की लिखावट जितनी सुंदर होती है वैसी बाल पेन या जेल पेन से संभव नहीं है। यही वजह है कि अब कई स्कूलों में भी स्याही वाली कलम के इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है।

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रियाज़ की दुकान पर कोलकाता के अलावा दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद तक से ग्राहक आते हैं। वह कहते हैं, "पूरे देश में मेरे ग्राहक हैं। अपनी कीमती कलम खराब होने पर वे मेरी दुकान का रुख करते हैं।"

रियाज़ नाम तो नहीं लेते लेकिन बताते हैं कि देश भर में उनके बड़े-बड़े ग्राहक हैं। उनकी बदौलत दाल-रोटी का खर्च आसानी से निकल जाता है।

वह कहते हैं, "हम तीन पीढ़ियों से यह दुकान चला रहे हैं। इसलिए इसे बंद करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठाता। मैं अपने बेटों से भी कहूंगा कि वे अपने बेटों को भी कलम की मरम्मत का यह हुनर सिखाएं।"

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संग्रहालय से कम नहीं
नाम भले अस्पताल हो, रियाज़ की दुकान दुर्लभ कलमों का संग्रहालय भी है। उनके पास दुनिया के हर ब्रांड की कलम मिल जाएगी।

वह बताते हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों से कलम के शौकीन लोग ख़रीदारी के लिए उनके पास पहुंचते हैं। उनके पास हर ब्रांड के आधुनिकतम नमूनों से लेकर 70-80 साल पुरानी कलमें मिल जाती हैं।


उनकी क़ीमत एक हज़ार से शुरू होकर एक लाख रुपए तक है। रियाज़ की दुकान में कोई मैकेनिक नहीं है। वह अपने भाई के साथ मिल कर ही पेनों की मरम्मत करते हैं।

अगर आपकी दुकान अस्पताल है तो क्या आपको डॉक्टर कहा जाए। इस सवाल पर रियाज़ कहते हैं, "डॉक्टर नहीं, बल्कि मुझे प्रोफ़ेसर या विशेषज्ञ कह सकते हैं। किसी भी कलम को कितनी भी जटिल बीमारी हो, मेरे हाथों में आते ही वह छू-मंतर हो जाती है।"

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वह कहते हैं कि कम्प्यूटर, स्मार्टफोन और आईपैड के बढ़ते प्रचलन के बावजूद कलम के ख़रीदार कम होने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं।

रियाज़ को इस बात का अफ़सोस है कि अब कलमों की क्वालिटी पहले जैसी नहीं रही। वह कहते हैं, "कलम चाहे कितनी भी क़ीमती हो, चार-पांच साल बाद उसमें ख़राबी आ ही जाती है।

जब तक कलमों को बीमारी होती रहेगी तब तक लोगों को इस अस्पताल की जरूरत पड़ती रहेगी। यही वजह है कि मेरी अगली पीढ़ियां भी इस दुकान को चलाती रहेंगी। मैंने अगर दुकान बंद कर दी तो लोग आख़िर कहां जाएंगे?"

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