{"_id":"99a619d6-39ee-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"blind-girl-and-boy-get-marry","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘अंधेरे’ में शुरू किया जिंदगी का सफर ","category":{"title":"Bizarre News Archives","title_hn":"हटके खबर आर्काइव","slug":"bizarre-news-archives"}}
‘अंधेरे’ में शुरू किया जिंदगी का सफर
मुजफ्फरनगर/कपिल कुमार।
Updated Thu, 29 Nov 2012 12:02 PM IST
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इलाहाबाद की अंशिता फूले नहीं समा रही। उसकी जिंदगी का सबसे अहम दिन जो था। एक हादसे में आंखों की रोशनी गंवाने वाली 32 साल की अंशिता शादी के बंधन में बंध गई। अजब बात ये है कि मुजफ्फरनगर का दूल्हा प्रदीप भी ब्लाइंड है। दोनों कुछ समय पहले देहरादून में ब्लाइंड स्कूल में पढ़ाई के दौरान एक-दूसरे के करीब आए।
शहर की दयानंद गुप्ता धर्मशाला 10 बजे शादी की खुशियों में डूबी थी। घराती बारात के आने की तैयारियों में चहल-कदमी कर रहे थे। किसी को बारात के खाने के इंतजाम की फिक्र थी तो कोई फेरों की रस्म का सामान जुटाने में व्यस्त था। आंखों में रोशनी के अभाव में दुल्हन अंशिता और दूल्हा प्रदीप भले ही एक-दूजे को न देख पा रहे हों, लेकिन उनके चेहरे पर ‘अंधेरे’ का कोई अफसोस नहीं था। मन में भविष्य का ताना-बाना बुनते हुए आशाओं का दामन थामे वह दोनों एक-दूसरे के हमसफर बन गए। इलाहाबाद के अल्लाहपुर कसबे की अंशिता श्रीवास्तव 16 साल पहले एक हादसे में अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी है। परिवार ने अंशिता का तमाम शहरों में इलाज कराया, लेकिन आंखों की रोशनी नहीं लौटी। उधर, मुजफ्फरनगर के लड़वा गांव निवासी 25 वर्षीय दलित प्रदीप कुमार भी सात साल पहले एक हादसे में अपनी आंखों की रोशनी गंवा बैठा था। इंटर पास प्रदीप और अंशिता की मुलाकात 2010-11 में देहरादून के एनआईवीएच इंस्टीट्यूट में हुई। यहां दोनों ने पढ़ाई के लिए दाखिला लिया था। दो वर्षों की मुलाकात के बाद दोनों ने जिंदगी का सफर एक साथ तय करने का फैसला किया। दोनों के परिवार भी इसके लिए सहज तैयार हो गए। शादी के बाद भी दोनों उच्च शिक्षा का सपना संजोए हैं।
रोशनी गई तो बने हमराह
प्रदीप और अंशिता जन्म से ब्लाइंड नहीं हैं। तितावी क्षेत्र में घर लौटते समय प्रदीप पर लूटपाट का विरोध करने पर बदमाशों ने गोली चला दी थी। इस दौरान गोली के छर्रे उसकी आंखों में लग गए। जिस वजह से वह अपनी आंखों की रोशनी खो बैठा। अंशिता भी 16 वर्ष की उम्र में एक आपरेशन के दौरान रोशनी गंवा बैठी। यही संयोग रहा कि दोनों विजातीय होने के बावजूद शादी के बंधन में बंध गए।
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शहर की दयानंद गुप्ता धर्मशाला 10 बजे शादी की खुशियों में डूबी थी। घराती बारात के आने की तैयारियों में चहल-कदमी कर रहे थे। किसी को बारात के खाने के इंतजाम की फिक्र थी तो कोई फेरों की रस्म का सामान जुटाने में व्यस्त था। आंखों में रोशनी के अभाव में दुल्हन अंशिता और दूल्हा प्रदीप भले ही एक-दूजे को न देख पा रहे हों, लेकिन उनके चेहरे पर ‘अंधेरे’ का कोई अफसोस नहीं था। मन में भविष्य का ताना-बाना बुनते हुए आशाओं का दामन थामे वह दोनों एक-दूसरे के हमसफर बन गए। इलाहाबाद के अल्लाहपुर कसबे की अंशिता श्रीवास्तव 16 साल पहले एक हादसे में अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी है। परिवार ने अंशिता का तमाम शहरों में इलाज कराया, लेकिन आंखों की रोशनी नहीं लौटी। उधर, मुजफ्फरनगर के लड़वा गांव निवासी 25 वर्षीय दलित प्रदीप कुमार भी सात साल पहले एक हादसे में अपनी आंखों की रोशनी गंवा बैठा था। इंटर पास प्रदीप और अंशिता की मुलाकात 2010-11 में देहरादून के एनआईवीएच इंस्टीट्यूट में हुई। यहां दोनों ने पढ़ाई के लिए दाखिला लिया था। दो वर्षों की मुलाकात के बाद दोनों ने जिंदगी का सफर एक साथ तय करने का फैसला किया। दोनों के परिवार भी इसके लिए सहज तैयार हो गए। शादी के बाद भी दोनों उच्च शिक्षा का सपना संजोए हैं।
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रोशनी गई तो बने हमराह
प्रदीप और अंशिता जन्म से ब्लाइंड नहीं हैं। तितावी क्षेत्र में घर लौटते समय प्रदीप पर लूटपाट का विरोध करने पर बदमाशों ने गोली चला दी थी। इस दौरान गोली के छर्रे उसकी आंखों में लग गए। जिस वजह से वह अपनी आंखों की रोशनी खो बैठा। अंशिता भी 16 वर्ष की उम्र में एक आपरेशन के दौरान रोशनी गंवा बैठी। यही संयोग रहा कि दोनों विजातीय होने के बावजूद शादी के बंधन में बंध गए।
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