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आखिर क्यों 89 करोड़ में बिकी ये किताब?
Updated Wed, 27 Nov 2013 01:39 PM IST
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साल 1640 में प्रकाशित अमेरिका में छपी पहली क़िताब 88 करोड़ 53 लाख 12 हज़ार पाँच सौ रुपए की रिकॉर्ड क़ीमत में नीलाम हुई।
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साल 1640 में प्रकाशित छह गुणा पाँच इंच आकार की इस धार्मिक पुस्तक को ख़रीदा अमरीकी व्यापारी और परोपकारी डेविड रुबेंस्टियन ने। उन्होंने इसके लिए फ़ोन पर बोली लगाई।
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'द बे साम बुक' नाम की इस क्लिक करें क़िताब का न केवल दुर्लभ होने की वजह से बल्कि इसके एक देश के भविष्य का प्रतीक होने की वजह से भी काफ़ी महत्व है।
नीलामघर सोदबी ने इस क़िताब के डेढ़ से तीन करोड़ डॉलर के बीच बिकने का अनुमान लगाया था।
यह क़िताब बोस्टन ओल्ड साउथ चर्च के संग्रह का हिस्सा थी। इस चर्च के पास इस क़िताब की दो प्रतियां थीं।
रिकॉर्ड क़ीमत में हुई नीलामी के बाद चर्च की वरिष्ठ पदाधिकारी नैंसी टेलर ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत अधिक है। हम जिस तरह के परोपकार करते हैं, उनके लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होगा।
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प्रिंटिंग प्रेस
शुद्धतावादियों के साल 1630 में इंग्लैंड से अमरीका के मैसाचुएट्स की ओर हुए महा विस्थापन के कुछ साल बाद विस्थापित हुए लोगों ने अपने भजनों की एक क़िताब लिखने और उसे प्रकाशित करने का फ़ैसला किया।
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उनके पास पहले से ही भजनों की क़िताब थी। लेकिन वो हिब्रू भाषा में थी और वे इसका अनुवाद अंग्रेजी में करना चाहते थे।
लंदन से इंग्लिश लाइसेंसिंग क़ानूनों से बचकर साल 1638 में 240 रिम कागज के साथ एक प्रिटिंग प्रेस भी लाया गया था।
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माना जाता है कि इस परियोजना के लिए रेवरेंड जोंस ग्लोवर ने चंदा जुटाया था। लेकिन यात्रा के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी विधवा कैंब्रिज में बस गईं। मैसाचुएट्स में उन्होंने प्रेस की स्थापना की।
इस प्रेस को स्टीफन डे चलाते थे, जो ग्लोवर के नौकर थे और तालों का व्यापार करते थे। उन्होंने 1640 में हिब्रू से अंग्रेजी में अनुवादित भजनों की 340 पेज की क़िताब की 1700 प्रतियां प्रकाशित कीं। इसी क़िताब को 'द बे साम बुक' के नाम से जाना जाता है।
इसकी प्रतियों को पूरे उपनिवेश में मंडलियों के इस्तेमाल के लिए रखा गया था। अगली सदियों में इस क़िताब के पाठ का 50 से अधिक बार पुनर्प्रकाशन किया गया। लेकिन पहले संस्करण की प्रतियाँ दशक भर में ही घिस-फट गईं।
'द बे साम बुक' की एक प्रति फ़िलाडेल्फिया रोजोनबाक पुस्तकालय में रखी हुई हैं। इस पुस्तकालय के निदेशक डेरिक डेरहर कहते हैं, ''यह कोई ऐसी क़िताब नहीं थी जिसे काल्पनिक, भड़कीला या किसी और रूप से क़ीमती बनाकर नहीं प्रकाशित की गई थी। इसका एक ही मूल्य था, वह है इसकी पाठ्यसामग्री।''
अंतिम मौक़ा
आज इसकी केवल 11 प्रतियों के ही बचे होने की जानकारी है। बोस्टन के ऐतिहासिक ओल्ड साउथ चर्च में रखी गई दो प्रतियों में से एक को सोदबी ने नीलाम किया।
द ओल्ड साउथ चर्च का कहना है कि उसका इसकी अंतिम कॉपी को बेचने को बेचने का कोई इरादा नहीं है। इस क़िताब की बाकी की नौ प्रतियां प्रमुख संग्रहों और पुस्तकालयों में हैं।
इससे पहले सबसे महंगी क़िताब का रिकार्ड जॉन जेम्स की 'आडुबांस बर्ड्स ऑफ़ अमेरिका' का नाम दर्ज था। यह क़िताब दिसंबर 2010 में साढ़े ग्यारह लाख डॉलर में बिकी थी।
'द बे साम बुक' की एक प्रति 1947 में रिकॉर्ड एक लाख 51 हज़ार डॉलर में नीलाम हुई थी। उस समय भी इस क़िताब ने गुटेनबर्ग की बाइबिल ओल्ड टेस्टामेंट, शेक्सपियर की फर्स्ट फोलियो और ब्राइड ऑफ़ अमरीका के मुक़ाबले रिकॉर्ड बनाया था।
क़िताब की आलोचना
अपनी ख़राब हालत को लेकर हो रही आलोचना के बाद भी 'द बे साम बुक' ने यह उपलब्धि हासिल की थी।
प्रकाशक और लेखक इसाह थॉमस ने दो सौ साल पहले लिखा था कि इसमें छापे की बहुत सी गलतियों की ओर इशारा किया था। उन्होंने लिखा था कि यह अच्छी कारीगिरी का प्रदर्शन नहीं करता है। इसके कंपोजिटर विराम चिन्हों को लगाने को लेकर पूरी तरह अनजान रहे होंगे।
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इसके बेढ़ब अनुवाद ने आलोचकों का काफी ध्यान खींचा है। अध्येताओं का कहना है कि हिब्रू भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद में अंतरआत्मा की आवाज़ का सहारा अधिक लिया गया है।
बिब्लोग्राफिकल सोसाइटी ऑफ अमरीका के पूर्व अध्यक्ष जॉन हूवर कहते हैं, 'द बे साम बुक' में आए कुछ हिब्रू के शब्दों से उपनिवेश की विद्वता का पता चलता है।