{"_id":"a03b24d8-1e6b-11e2-bae0-d4ae52bc57c2","slug":"47-yaer-goes-men-pain-with-stone-in-body","type":"story","status":"publish","title_hn":"47 साल से पाल रहा था जंग ए मैदान का पत्थर ","category":{"title":"Bizarre News Archives","title_hn":"हटके खबर आर्काइव","slug":"bizarre-news-archives"}}
47 साल से पाल रहा था जंग ए मैदान का पत्थर
रणजीत सिंह जाखी/कीर्तिनगर।
Updated Thu, 25 Oct 2012 11:47 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जंग-ए-मैदान में फौजी प्रताप सिंह राणा को बमों-गोलियों से मिला दर्द तो चंद महीने में ही भर गया। मगर शरीर में घुसा पत्थर पूरे 47 साल तक पीड़ा देता रहा। कमर में पैबस्त इस पत्थर को राणा अब तक अनचाहे ही ढोते रहे। कई परीक्षण हुए लेकिन इसका पता नहीं लग पाया। हाल में जब दर्द ज्यादा बढ़ा तो जॉलीग्रांट के हिमालयन अस्पताल से संपर्क किया। वहां के डाक्टरों ने पाया कि उनकी कमर में पत्थर घुसा है। उन्होंने इसका आपरेशन करके सफलता पूर्वक निकाला।
चौरास क्षेत्र के ढुंगरी थापली निवासी प्रताप सिंह राणा 19 अप्रैल 1953 में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे। उन्हें 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान कश्मीर बार्डर के लावर सेक्टर में तैनात किया गया। बतौर ओसी मोबाइल फायर कंट्रोलर दुश्मनों के सबसे नजदीक मौजूद प्रताप राणा का काम तोप से बम दागना था।
युद्ध के दौरान दो सिपाही, एक मेजर और हवलदार प्रताप सिंह दुश्मनों की टुकड़ी के सबसे नजदीक थे। अचानक दुश्मनों द्वारा फेंके गए बम का निशाना ये चारों लोग बने, जिसमें दोनों जवान और मेजर शहीद हो गए। जबकि प्रताप सिंह राणा बुरी तरह जख्मी। राणा को नहीं मालूम कि उसके बाद उन्हें क्या हुआ और उनका उपचार कैसे हुआ, लेकिन जब वे होश में आए, तो शरीर पर कई जगह जख्म थे।
विज्ञापन
जख्म भर जाने के वर्षों बाद उन्हें पेट में बाएं ओर दर्द का अहसास हुआ। स्थानीय अस्पतालों से लेकर एमएच देहरादून तक परीक्षण कराया, लेकिन कुछ पता नहीं लग सका। इस साल 77 वर्ष की आयु में जब दर्द असहनीय होने लगा, तो वे हिमालयन अस्पताल गए। जहां अल्ट्रासाउंड में मालूम हुआ कि उनकी कमर में पत्थर है। आपरेशन के बाद उनके कमर में फंसे पत्थर को गत छह अक्तूबर को सफलता पूर्वक बाहर निकाल लिया गया है।
विज्ञापन
चौरास क्षेत्र के ढुंगरी थापली निवासी प्रताप सिंह राणा 19 अप्रैल 1953 में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे। उन्हें 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान कश्मीर बार्डर के लावर सेक्टर में तैनात किया गया। बतौर ओसी मोबाइल फायर कंट्रोलर दुश्मनों के सबसे नजदीक मौजूद प्रताप राणा का काम तोप से बम दागना था।
विज्ञापन
युद्ध के दौरान दो सिपाही, एक मेजर और हवलदार प्रताप सिंह दुश्मनों की टुकड़ी के सबसे नजदीक थे। अचानक दुश्मनों द्वारा फेंके गए बम का निशाना ये चारों लोग बने, जिसमें दोनों जवान और मेजर शहीद हो गए। जबकि प्रताप सिंह राणा बुरी तरह जख्मी। राणा को नहीं मालूम कि उसके बाद उन्हें क्या हुआ और उनका उपचार कैसे हुआ, लेकिन जब वे होश में आए, तो शरीर पर कई जगह जख्म थे।
विज्ञापन
जख्म भर जाने के वर्षों बाद उन्हें पेट में बाएं ओर दर्द का अहसास हुआ। स्थानीय अस्पतालों से लेकर एमएच देहरादून तक परीक्षण कराया, लेकिन कुछ पता नहीं लग सका। इस साल 77 वर्ष की आयु में जब दर्द असहनीय होने लगा, तो वे हिमालयन अस्पताल गए। जहां अल्ट्रासाउंड में मालूम हुआ कि उनकी कमर में पत्थर है। आपरेशन के बाद उनके कमर में फंसे पत्थर को गत छह अक्तूबर को सफलता पूर्वक बाहर निकाल लिया गया है।