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... इसलिए महामंडलेश्वर बनने को उतावले रहते हैं संत
कुंभनगर/ब्यूरो/इंटरनेट डेस्क
Updated Wed, 13 Feb 2013 12:09 PM IST
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किसी भी संत को महामंडलेश्वर की पदवी मिलना एक बड़ा सम्मान है। इस पदवी के बाद धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में उसकी गरिमा, मान्यता बढ़ जाती है। हालांकि इससे अखाड़े में कोई अधिकार नहीं मिलता। अखाड़े में प्रबंध के लिए आठ श्रीमहंतों और आठ उपमहंतों का अष्टकौशल होता है। छावनी के धार्मिक अनुष्ठान रमता पंचों की देखरेख में पूरे किए जाते हैं लेकिन सम्मान के कारण संत महामंडलेश्वर बनने के लिए मोटी रकम की पुकार पूरी करते हैं।
परंपरानुसार किसी अखाड़े की ओर से महामंडलेश्वर बनाए जाने के बाद, शेष अखाड़ों के प्रतिनिधियों की ओर से सहमति की चादर ओढ़ाए जाने के बाद ही उसे संत समाज की मान्यता मिलती है। नियमानुसार महामंडलेश्वर बनने के लिए संत परंपरा से जुड़ाव सहित मर्यादित जीवन, मधुर व्यवहार जरूरी है।
शास्त्रों का ज्ञाता होने के साथ समाज के बीच उसकी स्वच्छ छवि और प्रभावपूर्ण कार्यशैली होनी चाहिए लेकिन कई अखाड़े इस परंपरा का पालन नहीं कर रहे हैं।
दो नए संतों सहित जूना में अब तक 174 को पदवी
पंचदशनाम जूना अखाड़े की ओर से मंगलवार को एक संत और एक साध्वी को महामंडलेश्वर की पदवी दी गई। इसमें ज्ञानेश्वर मठ, माटुंगा की साध्वी राधिकानंद सरस्वती और इंदौर के ओंकारेश्वर मठ के धर्मेंद्र पुरी शामिल हैं।
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मौजगिरि आश्रम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने चादर विधि के तहत चादर ओढ़ाकर उन्हें महामंडलेश्वर पद की दीक्षा और दायित्व सौंपा। इसी के साथ जूना के महामंडलेश्वरों की संख्या 174 पहुंच गई।
‘चादरविधि’ के तहत पुरोहितों की ओर से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीशुद्धि और पट्टाभिषेक के बाद पहले आचार्य और फिर अखाड़े के रमतापंचों श्रीमहंत हरिहरानंद भारती, श्रीमहंत हरदेव गिरि, श्रीमहंत पृथ्वी गिरि, श्रीमहंत केदारपुरी, सचिवों श्रीमहंत हरिगिरि, श्रीमहंत विद्यानंद सरस्वती, श्रीमहंत प्रेमपुरी, श्रीमहंत प्रेमगिरि सहित अन्य महामंडलेश्वरों तथा अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने भी उन्हें तिलक-चादर देकर महामंडलेश्वर के रूप में मान्यता दी।
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परंपरानुसार किसी अखाड़े की ओर से महामंडलेश्वर बनाए जाने के बाद, शेष अखाड़ों के प्रतिनिधियों की ओर से सहमति की चादर ओढ़ाए जाने के बाद ही उसे संत समाज की मान्यता मिलती है। नियमानुसार महामंडलेश्वर बनने के लिए संत परंपरा से जुड़ाव सहित मर्यादित जीवन, मधुर व्यवहार जरूरी है।
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शास्त्रों का ज्ञाता होने के साथ समाज के बीच उसकी स्वच्छ छवि और प्रभावपूर्ण कार्यशैली होनी चाहिए लेकिन कई अखाड़े इस परंपरा का पालन नहीं कर रहे हैं।
दो नए संतों सहित जूना में अब तक 174 को पदवी
पंचदशनाम जूना अखाड़े की ओर से मंगलवार को एक संत और एक साध्वी को महामंडलेश्वर की पदवी दी गई। इसमें ज्ञानेश्वर मठ, माटुंगा की साध्वी राधिकानंद सरस्वती और इंदौर के ओंकारेश्वर मठ के धर्मेंद्र पुरी शामिल हैं।
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मौजगिरि आश्रम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने चादर विधि के तहत चादर ओढ़ाकर उन्हें महामंडलेश्वर पद की दीक्षा और दायित्व सौंपा। इसी के साथ जूना के महामंडलेश्वरों की संख्या 174 पहुंच गई।
‘चादरविधि’ के तहत पुरोहितों की ओर से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीशुद्धि और पट्टाभिषेक के बाद पहले आचार्य और फिर अखाड़े के रमतापंचों श्रीमहंत हरिहरानंद भारती, श्रीमहंत हरदेव गिरि, श्रीमहंत पृथ्वी गिरि, श्रीमहंत केदारपुरी, सचिवों श्रीमहंत हरिगिरि, श्रीमहंत विद्यानंद सरस्वती, श्रीमहंत प्रेमपुरी, श्रीमहंत प्रेमगिरि सहित अन्य महामंडलेश्वरों तथा अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने भी उन्हें तिलक-चादर देकर महामंडलेश्वर के रूप में मान्यता दी।