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बारह सौ अवधूत स्वयं का पिंडदान कर बने संन्यासी

Thu, 07 Feb 2013 08:24 AM IST
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो Updated Thu, 07 Feb 2013 08:24 AM IST
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twelve hundred men take sannyas in maha kumbh

पंचदशनाम जूना अखाड़ा की ओर से बुधवार को फिर बारह सौ अवधूतों को संन्यास की दीक्षा दी गई। इससे पहले अपने-अपने गुरुओं के आश्रम में पंच संस्कार के बाद उन्हें अवधूत बनाया गया था। शाही स्नान पर्व मौनी अमावस्या से पहले जूना की ओर से यह दूसरी दीक्षा थी। पहले दौर में तकरीबन डेढ़ हजार अवधूतों ने पिंडदान कर संन्यास लिया था। इसमें देश के अनेक प्रांतों के अवधूत शामिल थे। दीक्षा के दौरान गंगा का तट हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजता रहा।

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अखाड़े के मेला प्रभारी और सचिव श्रीमहंत विद्यानंद सरस्वती तथा महंत केदार पुरी के नेतृत्व में अवधूतों की ओर से अपना पिंडदान किया गया। प्रक्रिया की शुरुआत वस्त्र त्याग कर लंगोटी देने से हुई। तीर्थपुरोहित संतोष मिश्र और संजय बधेका की देखरेख में मुंडन और स्नान कराने के बाद अवधूतों को नई लंगोटी पहनाकर उन्हें पलाश का दंड तथा कुल्हड़ का कमंडल देकर दंडी संन्यासी का स्वरूप दिया गया। पुरोहितों ने जनेऊ पहनाकर शरीर पर मलने को भभूत दिया।
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जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने नए बने संन्यासियों को इसका उद्देश्य और इसकी मर्यादाओं से परिचित कराया। अखाड़े की छावनी में भगवान दत्तात्रेय के सामने ‘विजयाहवन’ किया गया, जिसमें उन्हें मंत्र की दीक्षा दी गई। महंत राम गिरि के मुताबिक इस कठोर प्रक्रिया की शुरुआत से पहले उन्होंने चौबीस घंटे का व्रत रखकर साधना की। संन्यास दीक्षा में अखाड़े के श्रीमहंतों, सचिवों के अतिरिक्त संन्यासिनी अखाड़े की श्रीमहंत उमा गिरि, आशापूर्णा गिरि भी मौजूद थीं। पूरे समय तक कोतवालों ने व्यवस्था की कमान संभाली।
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काशी से लाया गया पलाश
संन्यासियों को दंड के लिए जो पलाश की डंडी दी गई, उसे काशी से मंगाया गया था। इसी तरह अखाड़े के रमता पंचों की ओर से संन्यासियों के शरीर पर लपेटने वाली भभूत काशी के विश्वनाथ मंदिर से ही लाई गई।


सोलह मढ़ी का संन्यासी अस्वस्थ
संन्यास दीक्षा के दौरान सोलह मढ़ी के एक संन्यासी की तबीयत बिगड़ने पर फौरन उसे गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया गया। बावजूद इसके पूरी प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आई, वह निर्बाध रूप से चलती रही।

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