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गंगा को बचाना है तो पहले गाद को हटाओ
इलाहाबाद/अरविंद सिंह
Updated Thu, 28 Feb 2013 10:55 AM IST
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गंगा को बचाने के लिए धरना-प्रदर्शन, सेमिनार, जागरूकता रैलियां करने वाले और नदी की सफाई के नाम पर भारी भरकम प्रोजेक्ट चलाने वाले ध्यान दें। तीन महीने गंगा की हर गतिविधि पर नजर रखने और पानी के रुख का अध्ययन करने के बाद पर्यावरणविदों का कहना है कि नदी में लगातार बढ़ रहा गाद बेहद खतरनाक है।
गाद के कारण नदी उथली हो गई है। इन दिनों जून की तुलना में जलस्तर अधिक है लेकिन इसके बाद भी कानपुर से इलाहाबाद तक कई स्थलों पर रेत के टीले दिख रहे हैं। गंगा जब खतरे का निशान छूने को आतुर थी, तब भी इलाहाबाद में रसूलाबाद, सलोरी, गोविंदपुर में कई जगह बीच में रेत दिख रही थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि गाद के कारण गंगा का पानी बारिश के दिनों में तेजी से निकल जाता है और बाद में केवल रेत दिखती है। गाद बढ़ने से गंदगी लगातार बढ़ती जा रही है।
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पानी, रेत और प्रदूषण के सभी पहलुओं के अध्ययन के बाद विशेषज्ञों की सलाह हैं कि विशेष सफाई अभियान चलाकर नदी के अस्तित्व को बचाया जा सकता है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरईए) ने भी देश के सभी आईआईटी से गंगा नदी को बचाने के लिए सहयोग मांगा है।
गंगा के प्रदूषण को लेकर लगातार चर्चाएं हो रगी हैं लेकिन मूल परेशानी दूर करने को लेकर ध्यान नहीं है। सी पहलुओं के अध्ययन के बाद विशेषज्ञों ने दावा किया है कि नदी की तलहटी में बढ़ते गाद के स्तर ने मुसीबत खड़ी कर दी है। अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि नदी में गाद का स्तर बढ़ने से नदी छिछली हो रही है। कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना जैसे शहरों के आसपास स्थिति ज्यादा ही खराब है। नदी छिछली होने से बारिश के दिनों में बाढ़ से जबरदस्त तबाही भी हो रही है।
वनों का कटान, पहाड़ों में ब्लास्टिंग समस्या की मुख्य वजह
विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वनों के कटान और विभिन्न हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए की जा रही ब्लास्टिंग समस्या की मुख्य वजह है। पहाड़ी इलाकों से ही नदी में भारी मात्रा में सिल्ट आ रही है जो मैदानी इलाकों में आते ही नदी की तलहटी में जम जा रही है। कई महीनों से अध्ययन कर रहे पर्यावरविद डॉ.विक्रम चौधरी, डॉ. कौशल नारायण, डॉ.श्वेता रस्तोगी ने बताया कि रिपोर्ट कई हिस्सों में केंद्र सरकार को दी गई है।
आईआईटी से मांगी गई मदद
गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए आईआईटी कानपुर समेत देश के सभी आईआईटी से मदद ली जा रही है। एनजीआरईए से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक सभी आईआईटी से यह रिपोर्ट मांगी गई है कि आखिरकार गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
गंगा नदी में गाद का बढ़ता जलस्तर चिंता का विषय है। गाद को लेकर टेक्निकल रिपोर्ट तैयार की जा रही है। गाद की सफाई के लिए समय रहते ठोस कदम न उठाए गए तो गंगा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए देश की सभी आईआईटी से मदद ली जा रही है।
प्रो. बीडी त्रिपाठी, सदस्य एनजीआरईए
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गाद के कारण नदी उथली हो गई है। इन दिनों जून की तुलना में जलस्तर अधिक है लेकिन इसके बाद भी कानपुर से इलाहाबाद तक कई स्थलों पर रेत के टीले दिख रहे हैं। गंगा जब खतरे का निशान छूने को आतुर थी, तब भी इलाहाबाद में रसूलाबाद, सलोरी, गोविंदपुर में कई जगह बीच में रेत दिख रही थी।
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विशेषज्ञों का कहना है कि गाद के कारण गंगा का पानी बारिश के दिनों में तेजी से निकल जाता है और बाद में केवल रेत दिखती है। गाद बढ़ने से गंदगी लगातार बढ़ती जा रही है।
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पानी, रेत और प्रदूषण के सभी पहलुओं के अध्ययन के बाद विशेषज्ञों की सलाह हैं कि विशेष सफाई अभियान चलाकर नदी के अस्तित्व को बचाया जा सकता है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरईए) ने भी देश के सभी आईआईटी से गंगा नदी को बचाने के लिए सहयोग मांगा है।
गंगा के प्रदूषण को लेकर लगातार चर्चाएं हो रगी हैं लेकिन मूल परेशानी दूर करने को लेकर ध्यान नहीं है। सी पहलुओं के अध्ययन के बाद विशेषज्ञों ने दावा किया है कि नदी की तलहटी में बढ़ते गाद के स्तर ने मुसीबत खड़ी कर दी है। अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि नदी में गाद का स्तर बढ़ने से नदी छिछली हो रही है। कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना जैसे शहरों के आसपास स्थिति ज्यादा ही खराब है। नदी छिछली होने से बारिश के दिनों में बाढ़ से जबरदस्त तबाही भी हो रही है।
वनों का कटान, पहाड़ों में ब्लास्टिंग समस्या की मुख्य वजह
विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वनों के कटान और विभिन्न हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए की जा रही ब्लास्टिंग समस्या की मुख्य वजह है। पहाड़ी इलाकों से ही नदी में भारी मात्रा में सिल्ट आ रही है जो मैदानी इलाकों में आते ही नदी की तलहटी में जम जा रही है। कई महीनों से अध्ययन कर रहे पर्यावरविद डॉ.विक्रम चौधरी, डॉ. कौशल नारायण, डॉ.श्वेता रस्तोगी ने बताया कि रिपोर्ट कई हिस्सों में केंद्र सरकार को दी गई है।
आईआईटी से मांगी गई मदद
गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए आईआईटी कानपुर समेत देश के सभी आईआईटी से मदद ली जा रही है। एनजीआरईए से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक सभी आईआईटी से यह रिपोर्ट मांगी गई है कि आखिरकार गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
गंगा नदी में गाद का बढ़ता जलस्तर चिंता का विषय है। गाद को लेकर टेक्निकल रिपोर्ट तैयार की जा रही है। गाद की सफाई के लिए समय रहते ठोस कदम न उठाए गए तो गंगा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए देश की सभी आईआईटी से मदद ली जा रही है।
प्रो. बीडी त्रिपाठी, सदस्य एनजीआरईए