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निर्मल गंगाः अब साधु-महात्मा नहीं लेंगे जल समाधि
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो
Updated Sun, 20 Jan 2013 04:03 PM IST
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गंगा की निर्मलता को बचाए रखने के लिए अखाड़ों की ओर से अनूठी पहल की गई है। अब साधु-महात्माओं को जल में समाधि देने के बजाय भूसमाधि दी जाएगी। इसके लिए संन्यासी परिषद और संन्यासी अखाड़ों की ओर से सहमति व्यक्त की गई है। नई परंपरा के तहत उन्हें पवित्र नदियों के किनारे भू समाधि दी जाएगी ताकि शरीर को प्रवाहित करने से गंगा में किसी भी प्रकार का प्रदूषण न फैले।
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जूना अखाड़े के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरि के मुताबिक समाधि स्थल के लिए प्रदेश सरकार से संगम के किनारे भूमि की मांग की गई है। बातचीत के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पूरी तरह से विचार का भरोसा भी दिलाया है। ऐसे में शासन की ओर से अनुमति मिली तो कुंभ के दौरान ही संगम की रेती पर इसकी स्थापना संभव हो सकेगी।
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बता दें कि उत्तराखंड में जमीन के लिए सिद्धांत रूप में शासन की ओर से ऐसी सहमति बनी थी। शासन की ओर से अखाड़ों को कई जगहें भी सुझाई गई थीं, लेकिन प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। अब प्रयाग महाकुंभ के दौरान दोबारा इसकी पहल की गई है।
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साधु संतों की तरफ से यह बड़ा बदलाव न्यायालय के मान और संन्यासियों की परंपरा की रक्षा के लिए किया गया है। न्यायालय ने नदियों में जल समाधि पर प्रतिबंध लगा रखा है। संन्यासियों का भी मानना है कि गंगा, यमुना, गोदावरी, कावेरी, क्षिप्रा, नर्मदा, सतलुज, व्यास, झेलन, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सरयू आदि पवित्र नदियों के किनारे भू समाधि स्थल बने तो प्रदूषण की समस्या दूर हो सकती है।
संगम किनारे बनेंगी समाधियां
संन्यासियों को ध्यानमुद्रा में समाधि दी जाती है। इसके लिए कम से कम तीन गुणे तीन वर्ग फीट जगह जरूरी है। श्रीमहंत हरिगिरि के मुताबिक समाधि स्थल को सिर्फ कच्चे गारे से जोड़ा जाएगा, किसी भी तरह का स्थायी निर्माण नहीं रहेगा। ऐसे में तकरीबन छह वर्षों बाद वहां किसी दूसरे को समाधि दी जा सकती है। इसका प्रस्ताव शासन को दिया गया है।
किन्हें दी जाती है जल समाधि
जल समाधि ऐसे संत-महात्माओं को दी जाती है, जो मूलत: नाथ संप्रदाय या नागा संन्यासी परंपरा से जुड़े होते हैं। इसमें ऐसे संत शामिल होते हैं, जो जीते जी पिंडदान के बाद शिखा और सूत्र का परित्याग कर देते हैं। जूना के मेला अधिकारी श्रीमहंत विद्यानंद सरस्वती के मुताबिक इसका उद्देश्य यह होता था कि मृत्यु के बाद भी शरीर जलचरों का आहार बने लेकिन जल में निरंतर कम हो रहे जलचरों और निरंतर प्रदूषित हो रही गंगा को बचाने के लिए ऐसी पहल की गई है।