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अखंड साधना, ‘अग्नि स्नान’ कर बनेंगे तपस्वी
इलाहाबाद/ब्यूरो
Updated Fri, 15 Feb 2013 03:15 PM IST
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संगम की रेती एक और सनातन परंपरा, त्याग और तपस्या के संकल्प की साक्षी बनेगी। दिगंबर अनी अखाड़े के तहत अखिल भारतीय पंच तेरह भाई त्यागी खालसा की छावनी में शुक्रवार से अद्भुत साधना से साक्षात्कार होगा। वैष्णवों के रामानंद संप्रदाय से जुड़े संतों की निराली जीवन शैली के तहत ‘सूर्य और अग्नि स्नान’ करके पांच सौ साधु तपस्वी बनेंगे।
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अठारह वर्षों की कठिन साधना की शुरुआत संगम की रेती से वसंत पंचमी से होगी। कई वर्षों की साधना के बाद उन्होंने त्याग का संयम संजोया है, अब संकल्प की बारी है। बसंत पंचमी से आरंभ साधना का संकल्प ज्येष्ठ गंगा दशहरा को पूरा होगा। चार महीने के दौरान साधक कई-कई स्थान बदलेंगे लेकिन प्रत्येक दिन दोपहर बारह बजे से पहले उनके कदम जहां थमे, वहीं शुरू हो जाएगी साधना जो कम से कम चार घंटे चलेगी।
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आग का घेरा बना लेने के दौरान किसी भी अन्य व्यक्ति को न उनसे मिलने और न ही पैर छूने की अनुमति होगी। अगले दिन फिर यही क्रम दोहराया जाएगा। एक चरण के तहत तीन वर्षों तक बसंत पंचमी से ज्येष्ठ गंगा दशहरा अनुष्ठान जारी रहेगा। ‘अग्नि स्नान’ के छह चरणों में क्रमश: अभ्यास का क्रम बढ़ता जाएगा। प्रत्येक चरण के साथ अनुष्ठान और कठिन होता जाएगा।
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बाल तपस्वी रामदास कहते हैं, तपस्या के संकल्प का उद्देश्य अग्नि और सूर्य के तेज को आत्मसात करने की कामना है। काका गुरु महामंडलेश्वर परमेश्वर दास जी से शुरू हुई परंपरा का निर्वाह करने को देश भर से साधु, खालसे की छावनी में जुटने लगे हैं।
तेज होता जाएगा तप का क्रमिक अभ्यास
अठारह वर्षों की अखंड तप की साधना में तीन-तीन वर्षों की साधना अलग-अलग चरणों के नाम होगी। पंच धूनी से शुरुआत के बाद सप्तधूनी, द्वादश धूनी, चौरासी धूनी, कोटि धूनी और अंत में कोटि खप्पर से तपस्या का संकल्प पूरा होगा। कोटि खप्पर में तो सिर पर आग रखकर 108 बार आहुतियां डाली जाएंगी। पंच धूनी की तपस्या में साधक अपने चारों ओर पांच धूनी जलाएंगे।