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अखाड़ों की अदालत में न देर, न अंधेर

Thu, 24 Jan 2013 09:21 PM IST
महाकुंभ नगर/अनिल सिद्धार्थ
महाकुंभ नगर/अनिल सिद्धार्थ Updated Thu, 24 Jan 2013 09:21 PM IST
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not late justice akharas court maha kumbh

दुनिया भर में धर्म, अध्यात्म का संदेश फैला रहे अखाड़े अनुशासन के मामले में भी किसी से कम नहीं। अखाड़ों की अपनी अदालत है, जिसमें सामान्य साधु, महापुरुष से लेकर श्रीमहंत तक के बीच उपजे किसी भी तरह के विवाद का फैसला फटाफट होता है। इस अदालत में तारीख पर तारीख नहीं पड़ती बल्कि अखाड़े के श्रीमहंत और प्रधान पूरी स्थितियों पर विचार के बाद न्याय करते हैं।

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अखाड़े की छावनी में धर्मध्वजा की स्थापना के साथ ही आराध्य की सत्ता सर्वोच्च हो जाती है। अबकी मेले की 44 दिनों की अवधि के लिए आठ प्रधानों की नियुक्ति की गई है। इसमें से क्रमश: दो-दो प्रधान 11-11 दिनों की व्यवस्था संभालते हैं। दो प्रधानों की ‘डबल बेंच’ के पास ही अखाड़े के कोतवाल दोषियों को पकड़कर लाते हैं और न्याय होता है। अपराध सामान्य श्रेणी का हुआ तो प्रधान स्वयं ही न्याय करते हैं, गंभीर होने पर पंचों की राय ली जाती है।
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निरंजनी अखाड़े के श्रीमहंत रवींद्र पुरी के मुताबिक अखाड़े में अपराध के लिए आर्थिक सजा नहीं दी जाती। इसके लिए गंगा में डुबकी से लेकर अखाड़े से निष्कासन जैसी सजा शामिल है। महंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक, सजा का उद्देश्य उसे उसकी गलती का एहसास करना होता है ताकि वह दोबारा उसे न दोहराए।
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पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के श्रीमहंत महेश्वरदास ने बताया कि दोषी साधु को अखाडे़ में सेवा करने की सजा दी जाती है। इसके तहत वह बर्तन, भंडारा, छावनी में काम करने के साथ संतों को दातून तक उपलब्ध कराता है।

गंगा में 108 डुबकी लगाने का दंड
दोषी साधु को अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में पांच से लेकर 108 डुबकी लगाने के लिए भेजा जाता है। डुबकी के बाद वह भीगे कपड़े में ही देवस्थान पर आकर अपनी गलती के लिए क्षमा मांगता है। फिर पुजारी पूजा स्थल पर रखी ‘ब्रह्मजली’ का प्रसाद देकर दोषमुक्त करते हैं। विवाह, हत्या या दुष्कर्म जैसे मामलों में उसे अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है।

आपातकाल में बजाया जाता है ‘दशनामी घंटा’
कुंभ मेले की छावनी से इतर मुख्यालय में किसी तरह के विवाद के समाधान या न्याय पाने के लिए पीड़ित व्यक्ति किसी भी समय परिसर में लगा ‘दशनामी घंटा’ बजाता है। सायरन की तरह इसके बजते ही सभी एकजगह जुटकर उनकी समस्या सुनकर उसे न्याय करते हैं।

जिन अपराधों पर है सजा
-अखाड़े के दो सदस्य आपस में लड़ें-भिड़ें
-कोई विवाह कर ले या दुष्कर्म का दोषी हो
-छावनी के भीतर से किसी का सामान चोरी करना
-देवस्थान को अपवित्र करे या वर्जित स्थान पर प्रवेश
-कोई साधु किसी यात्री, यजमान से अभद्र व्यवहार करे
-यदि अखाड़े के मंच ‘चेहरा’ पर कोई अपात्र चढ़ जाए

पौष पूर्णिमा की तैयारी में प्रशासन ने झोंकी ताकत
मेला प्रशासन ने 27 जनवरी को पौष पूर्णिमा के स्नान की तैयारी पूरी कर ली है। पौष पूर्णिमा पर तकरीबन 55 लाख स्नानार्थियों के आने का अनुमान है। घाटों पर बैरिकेडिंग भी करा दी गई है। तैयारियों की समीक्षा करने बृहस्पतिवार को मुख्य सचिव जावेद उस्मानी भी संगम नगरी पहुंचे और मेला क्षेत्र का निरीक्षण भी किया।


प्रशासन अब पौष पूर्णिमा के लिए चल रही तैयारियों को अंतिम रूप दे रहा है। मकर संक्रांति के मुकाबले इस स्नान पर्व में आधी भीड़ आने का अनुमान है लेकिन मेला प्रशासन तैयारियों में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहता। कुंभ-2001 में पौष पूर्णिमा पर तकरीबन 50 लाख लोगों ने स्नान किया था। प्रशासन का अनुमान है कि इस बार पांच लाख स्नानार्थी बढ़ सकते हैं।

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