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मौनी स्नान: एक करोड़ लीटर गंगाजल साथ ले गए श्रद्धालु
इलाहाबाद/विजय जैन
Updated Mon, 11 Feb 2013 04:40 PM IST
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देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से एक बार अमेरिका में किसी ने पूछा कि आपके यहां सबसे अच्छा जल कौन सा है तो उन्होंने बताया कि यमुना जल। इस पर वहां बैठे एक वैज्ञानिक ने कहा कि हमने तो सुना है कि गंगा जल सबसे अच्छा होता है तो पंडित नेहरू ने कहा कि गंगा जल नहीं "ब्रम्ह द्रव्य" है।
पंडित नेहरू की इस राय से आज भी करोड़ों श्रद्धालु इत्तफाक रखते हैं। यही वजह है कि द्वितीय शाही स्नान पर्व मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान, दर्शन और आचमन को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। करीब 3 करोड़ श्रद्धालुओं ने न सिर्फ गंगा में पुण्य की डुबकी लगाई बल्कि गंगाजल को प्रसाद स्वरूप अपने साथ ले गए।
एक अनुमान के मुताबिक श्रद्धालु विभिन्न घाटों से तकरीबन एक करोड़ लीटर गंगाजल अपने साथ ले गए। ब्रह्म मुहूर्त से ही गंगा स्नान को श्रद्धालुओं को रेला घाटों पर आ डटा। गंगा स्नान पूजन करने के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु अमृत रूपी गंगा जल को अपने साथ ले गए। इसके पीछे उनकी मंशा थी, उनके वह परिजन जो यहां पुण्य की डुबकी लगाने नहीं आ सके, वह गंगा का आचमन कर अपने अंतर्मन को निर्मल कर लें। गंगा घाट पर आए श्रद्धालुओं में कोई पांच लीटर तो कोई दो लीटर गंगा जल अपने साथ ले गया।
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मध्यप्रदेश के रीवा जिले से आई संगीता पराशर ने बताया कि कई वर्षो के प्रयास के बाद वह प्रयाग आ पाई हैं। गंगा जल घर ले जाकर वह अपने परिजनों को भी इस पुण्य में भागीदार बनाना चाहती हैं। जबलपुर से आए मनोज खत्री संगम में डुबकी लगाकर फूले नहीं समा रहे थे। बोले, वर्षो पुरानी मुराद आज पूरी हो गई। वह भी अपने साथ यहां के अमृत रूपी प्रसाद को घर ले जा रहे हैं।
मिर्जापुर से आए लखन लाल कहते हैं कि गंगा जल की अपनी एक अलग महत्ता है। यह जल हमें पापों से मुक्ति तो दिलाता ही है, घर में होने वाले पूजा पाठ के आयोजनों में भी इसकी जरूरत पड़ती है। रामपुर से आई रजनी, कानपुर से आई गायत्री व इलाहाबाद करछना के गौरीशंकर भी बर्तनों में भर भर कर गंगा जल अपने साथ ले जा रहे हैं।
बताते हैं किगंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती में डुबकी लगाकर उन्हें जो पुण्य प्राप्त हुआ है, परिजनों को भी इस पुण्य में शामिल करेंगे। देशी ही नहीं विदेशी श्रद्धालु भी डुबकी के बाद गंगाजल अपने साथ ले गए।
टीकरमाफी आश्रम के महंत स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी बताते हैं कि व्यक्ति ने जितनी आस्था से स्नान किया है, पुण्य भी उसको उसी हिसाब से मिलता है। यहां का प्रसाद या गंगा जल जब अन्यत्र ले जाया जाता है तो उसकी महत्ता सौ गुना बढ़ जाती है। गंगा जल के बारे में आदिगुरु शंकराचार्य ने कहा था कि किसी व्यक्ति के शरीर में जिव्हा के सहारे अगर एक बूंद भी गंगा जल पहुंच जाता है तो यमराज उसकी चर्चा तक नहीं करते।
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पंडित नेहरू की इस राय से आज भी करोड़ों श्रद्धालु इत्तफाक रखते हैं। यही वजह है कि द्वितीय शाही स्नान पर्व मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान, दर्शन और आचमन को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। करीब 3 करोड़ श्रद्धालुओं ने न सिर्फ गंगा में पुण्य की डुबकी लगाई बल्कि गंगाजल को प्रसाद स्वरूप अपने साथ ले गए।
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एक अनुमान के मुताबिक श्रद्धालु विभिन्न घाटों से तकरीबन एक करोड़ लीटर गंगाजल अपने साथ ले गए। ब्रह्म मुहूर्त से ही गंगा स्नान को श्रद्धालुओं को रेला घाटों पर आ डटा। गंगा स्नान पूजन करने के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु अमृत रूपी गंगा जल को अपने साथ ले गए। इसके पीछे उनकी मंशा थी, उनके वह परिजन जो यहां पुण्य की डुबकी लगाने नहीं आ सके, वह गंगा का आचमन कर अपने अंतर्मन को निर्मल कर लें। गंगा घाट पर आए श्रद्धालुओं में कोई पांच लीटर तो कोई दो लीटर गंगा जल अपने साथ ले गया।
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मध्यप्रदेश के रीवा जिले से आई संगीता पराशर ने बताया कि कई वर्षो के प्रयास के बाद वह प्रयाग आ पाई हैं। गंगा जल घर ले जाकर वह अपने परिजनों को भी इस पुण्य में भागीदार बनाना चाहती हैं। जबलपुर से आए मनोज खत्री संगम में डुबकी लगाकर फूले नहीं समा रहे थे। बोले, वर्षो पुरानी मुराद आज पूरी हो गई। वह भी अपने साथ यहां के अमृत रूपी प्रसाद को घर ले जा रहे हैं।
मिर्जापुर से आए लखन लाल कहते हैं कि गंगा जल की अपनी एक अलग महत्ता है। यह जल हमें पापों से मुक्ति तो दिलाता ही है, घर में होने वाले पूजा पाठ के आयोजनों में भी इसकी जरूरत पड़ती है। रामपुर से आई रजनी, कानपुर से आई गायत्री व इलाहाबाद करछना के गौरीशंकर भी बर्तनों में भर भर कर गंगा जल अपने साथ ले जा रहे हैं।
बताते हैं किगंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती में डुबकी लगाकर उन्हें जो पुण्य प्राप्त हुआ है, परिजनों को भी इस पुण्य में शामिल करेंगे। देशी ही नहीं विदेशी श्रद्धालु भी डुबकी के बाद गंगाजल अपने साथ ले गए।
टीकरमाफी आश्रम के महंत स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी बताते हैं कि व्यक्ति ने जितनी आस्था से स्नान किया है, पुण्य भी उसको उसी हिसाब से मिलता है। यहां का प्रसाद या गंगा जल जब अन्यत्र ले जाया जाता है तो उसकी महत्ता सौ गुना बढ़ जाती है। गंगा जल के बारे में आदिगुरु शंकराचार्य ने कहा था कि किसी व्यक्ति के शरीर में जिव्हा के सहारे अगर एक बूंद भी गंगा जल पहुंच जाता है तो यमराज उसकी चर्चा तक नहीं करते।