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महाराजा रणजीत सिंह के परपोते ने रमाई काशी में धूनी

Wed, 20 Feb 2013 10:55 PM IST
वाराणसी/अनूप ओझा
वाराणसी/अनूप ओझा Updated Wed, 20 Feb 2013 10:55 PM IST
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maharaja ranjit singh grandson nakshatra singh in varanasi

पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के परपोते भोले की नगरी काशी में गंगा तट पर धूनी रमा रहे हैं। कुंभ की ‘क्लोजिंग सेरेमनी’ के लिए प्रयाग से यहां पहुंची नागा साधुओं की टोली के साथ उनका भी एक छोटा सा टेंट लगा है।

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नब्बे साल के हो चुके क्वीन मैरी के पोते को नागा वेश में अब भी बेहद चुस्त देख कोई भी चकित रह जाएगा। नागा साधु कैप्टन अल्फा ग्रुस के नाम से गंगा तट पर साधनारत बाबा कोई और नहीं बल्कि कभी कोहिनूर हीरा जीतने वाले राजा रणजीत सिंह के खानदान के आखिरी चिराग नक्षत्र सिंह हैं।
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काशी में बाबा विश्वनाथ का शिखर स्वर्ण मंडित कराने के लिए 1839 में 22 मन सोना दान करने वाले राजा रणजीत सिंह के परपोते अल्फा ग्रुस जनता से किसी तरह का लगान (कर) न वसूलने वाली सत्ता देखना चाहते हैं।
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राजा रणजीत सिंह के इकलौते पुत्र राजा दिलीप सिंह की पहली संतान राजा मोहला सिंह की पत्नी नेहाल कौर ने 1923 में बर्मिंघम (इंग्लैंड) में नक्षत्र सिंह नाम के जिस पुत्र को जन्म दिया था, वही बाद में नागा अल्फा ग्रुस बन गए। दो दिन पहले कर्नाटक स्टेट घाट की मढ़ी पर अल्फा ग्रुस ने अपना टेंट लगाया।

चौतरफा कनात से बंद रहने वाले उनके तंबू में पांच से अधिक नागा संन्यासी रह रहे हैं। उर्दू, अंग्रेजी पर समान अधिकार रखने वाले बाबा नब्बे की उम्र में भी तड़के बिस्तर छोड़ ध्यान-साधना में जुट जाते हैं।

ऐसे बन गए साधु
अल्फा ग्रुस ने बताया कि चार साल की उम्र में पहली बार उन्हें भारत लाया गया। फिर मां ने नागा पुरुषोत्तम गिरि महाराज को प्रसाद के तौर पर उन्हें अखाड़े में सौंप दिया। 1938 में उनका संस्कार नागा साधु के तौर पर हो गया। तभी से वह साधनारत हैं।


भारतीय सेना के बाद नेपाल की सेना को योगा और मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देने वाले अल्फा ग्रुस ने पायलट की भी ट्रेनिंग ली है। नेपाली सैन्य बेडे़ में इस्तेमाल की जाने वाली खुखरी आज भी उनकी कमर की शोभा बढ़ा रही है।

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