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आस्था की नगरी में लोगों की जूठन पर पलते हैं ये परिवार
विजय जैन
Updated Wed, 20 Feb 2013 11:39 AM IST
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कहने को दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला महाकुंभ। संगम के तट पर बसे आस्था के शहर में जहां अध्यात्म की अपार दौलत बरस रही है, जहां कई आश्रमों में लाखों-करोड़ों का खर्च कर महलनुमा पंडाल बनाए गए हैं, जहां 24 घंटे 56 भोग खाए जा रहे हैं, वहीं एक इलाका ऐसा भी है, जहां लोग बांस के महज़ चार फीट लंबे पंडालों में जीने को मजबूर हैं। इन आश्रमों की जूठन खाने को मजबूर हैं। आश्रम के भंडारों से एकत्रित किए गए इन खानों को खुद भी खाते हैं और शेष सुखा कर अपने मवेशियों को खिलाते हैं।
त्रिवेणी तट पर लगे अमृत कुंभ क्षेत्र में जैसे ही प्रवेश करेंगे यहां बने अखाड़ों की चकाचौंध को देख हैरत में पड़ जाएंगे। एक-एक अखाड़े में करोड़ों का खर्च किया गया है। जहां भी नज़र जाती है, अध्यात्म की दौलत की चकाचौंध से आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। बाबा बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों में घूमते नज़र आ जाएंगे, लेकिन इस आध्यात्मिक नगर में एक इलाक़ा ऐसा भी है, जहां का नज़ारा देख आपका कलेजा मुंह को आ जाएगा। यहां टेंटों में रहने वाले 56 भोग का स्वाद जरूर चख लेते हैं।
संगम तट पर एक कोने में इनको मेला प्रशासन ने एक विशेष स्थान दिया है। ये सभी लोग उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके से आए हैं। इन पर मेले की साफ़ सफाई की ज़िम्मेदारी है। सभी यहां करीब दो महीने से हैं और दो महीने से बाबाओं और आश्रमों का जूठन खाकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जूठन बच्चों का खिलौना बन गया है। बच्चे इन रोटियों से खेलते रहते हैं, जब भूख लगती है तो इन्हें खा लेते हैं।
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त्रिवेणी तट पर लगे अमृत कुंभ क्षेत्र में जैसे ही प्रवेश करेंगे यहां बने अखाड़ों की चकाचौंध को देख हैरत में पड़ जाएंगे। एक-एक अखाड़े में करोड़ों का खर्च किया गया है। जहां भी नज़र जाती है, अध्यात्म की दौलत की चकाचौंध से आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। बाबा बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों में घूमते नज़र आ जाएंगे, लेकिन इस आध्यात्मिक नगर में एक इलाक़ा ऐसा भी है, जहां का नज़ारा देख आपका कलेजा मुंह को आ जाएगा। यहां टेंटों में रहने वाले 56 भोग का स्वाद जरूर चख लेते हैं।
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संगम तट पर एक कोने में इनको मेला प्रशासन ने एक विशेष स्थान दिया है। ये सभी लोग उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके से आए हैं। इन पर मेले की साफ़ सफाई की ज़िम्मेदारी है। सभी यहां करीब दो महीने से हैं और दो महीने से बाबाओं और आश्रमों का जूठन खाकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जूठन बच्चों का खिलौना बन गया है। बच्चे इन रोटियों से खेलते रहते हैं, जब भूख लगती है तो इन्हें खा लेते हैं।
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