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महाकुंभ के अजब रंग: हिंदू संत बनने को आतुर फिरंगी
इलाहाबाद/विजय जैन
Updated Wed, 13 Feb 2013 12:55 PM IST
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कुंभ नगरी में आकर्षण के केंद्र बने विदेशी श्रद्धालु खुद हिंदू संत बनने को आतुर दिख रहे हैं। उनकी भूमिका वेद, तप, अध्यात्म और धर्म प्रचार तक सीमित नहीं है। अखाड़ों और आश्रमों की व्यवस्था में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जो किसी धर्म गुरु के शिष्य हैं और अपने-अपने देशों में अपने गुरु के योग-अध्यात्म केंद्र चलाते हैं। वहां ये लोग भी शिष्य बनाते हैं और उन्हें कुंभ जैसे अवसरों पर लेकर आते हैं।
इटली के डेविड देल्गेतो और उनकी पत्नी फ्रांसेस्का पैन्तानो भारतीय मुद्रा में दिखते हैं। फ्रांसेस्को साड़ी लपेटे, बिंदिया, सिंदूर, मेंहदी लगाए सबको नमस्ते करती नजर आती हैं।
बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के बरूनो बर्गर 13 साल से हिंदू धर्म से जुड़े हैं, वहीं हिंदी सिखाने का स्कूल खोल रखा है। कल्पवास कर रहे हैं, तीन बार स्नान और एक टाइम खुद के हाथ का बना भोजन। ये इससे पहले 2007 में भी अर्धकुंभ कर चुके हैं।
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महामंडलेश्वर पुरीजी महाराज के शिविर में चेक रिपब्लिक के वासुदेव ट्राली-बेलचा लेकर जमीन साफ कर रहे हैं तो लैंका फूलों की क्यारियां दुरुस्त कर रही हैं। यहीं की तुलसी हिंदू धर्म से बहुत प्रभावित हैं, कहती हैं, भारत सहृदय लोगों का देश है।
ऑस्ट्रेलिया के सिडनी की इल्डर किचेन संभाल रही हैं तो वहां के फिजियोथेरेपिस्ट और यहां महामंडलेश्वर जसराज उपनिषद और भगवत गीता में निपुण हैं, 1994 से हिंदू धर्म से जुड़े हैं और कुंभ में आए हैं। स्लोवानिया की स्पैल पुकाजी यहां आकर दुर्गा देवी हो चुकी हैं।
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के आंद्रे टर्नर अपनी पत्नी वर्जीनिया के साथ कुंभ में श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं। इस दम्पति के चार बच्चे और तीन दोस्त भी आए हैं। टर्नर परिवार 1989 से हिंदू धर्म से जुड़ा है और इस बार कुंभ में ये कल्पवास भी कर रहे हैं। इन लोगों ने श्रद्धालुओं की सेवा करने का अद्भुत तरीका निकाला है। वे 18 गुना 6 फीट की एक नाव बनाकर लोगों को संगम पर इस सिरे से दूसरे सिरे तक श्रद्धालुओं को नाव के पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
वर्जीनिया हिंदू धर्म की गहरी जड़ों पर आश्चर्य चकित हैं। हार्वर्ड विश्विद्यालय के बिजनेस स्कूल का रिसर्च ग्रुप पांच दिन तक कुंभ में 'क्या धरती पर इतना बड़ा आयोजन संभव है' जैसे विषय पर शोध कर वापस जा चुका है।
पायलट बाबा भगवा वस्त्र धारण करने से पहले भारतीय सेना में विंग कमांडर थे। अपनी पूरी पेंशन फौजियों की विधवाओं के लिए दे देते हैं। उनके शिष्य स्वामी आनंद सरस्वती ने रूस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, लेकिन अब अध्यात्म में रच बस गए हैं। कहते हैं, 'आधुनिक परिधान पहन जो पाना था पा लिया, अब गेरुए में उच्चतम पाने की इच्छा है।'
भगवाधारी इलिया अब विष्णु हैं और रूस में 108 मंदिरों की श्रृंखला चलाते हैं। व्लादिमिर ध्यान में मग्न है, अब इसका नाम विवेकानंद गिरी हो गया है।
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इटली के डेविड देल्गेतो और उनकी पत्नी फ्रांसेस्का पैन्तानो भारतीय मुद्रा में दिखते हैं। फ्रांसेस्को साड़ी लपेटे, बिंदिया, सिंदूर, मेंहदी लगाए सबको नमस्ते करती नजर आती हैं।
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बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के बरूनो बर्गर 13 साल से हिंदू धर्म से जुड़े हैं, वहीं हिंदी सिखाने का स्कूल खोल रखा है। कल्पवास कर रहे हैं, तीन बार स्नान और एक टाइम खुद के हाथ का बना भोजन। ये इससे पहले 2007 में भी अर्धकुंभ कर चुके हैं।
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महामंडलेश्वर पुरीजी महाराज के शिविर में चेक रिपब्लिक के वासुदेव ट्राली-बेलचा लेकर जमीन साफ कर रहे हैं तो लैंका फूलों की क्यारियां दुरुस्त कर रही हैं। यहीं की तुलसी हिंदू धर्म से बहुत प्रभावित हैं, कहती हैं, भारत सहृदय लोगों का देश है।
ऑस्ट्रेलिया के सिडनी की इल्डर किचेन संभाल रही हैं तो वहां के फिजियोथेरेपिस्ट और यहां महामंडलेश्वर जसराज उपनिषद और भगवत गीता में निपुण हैं, 1994 से हिंदू धर्म से जुड़े हैं और कुंभ में आए हैं। स्लोवानिया की स्पैल पुकाजी यहां आकर दुर्गा देवी हो चुकी हैं।
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के आंद्रे टर्नर अपनी पत्नी वर्जीनिया के साथ कुंभ में श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं। इस दम्पति के चार बच्चे और तीन दोस्त भी आए हैं। टर्नर परिवार 1989 से हिंदू धर्म से जुड़ा है और इस बार कुंभ में ये कल्पवास भी कर रहे हैं। इन लोगों ने श्रद्धालुओं की सेवा करने का अद्भुत तरीका निकाला है। वे 18 गुना 6 फीट की एक नाव बनाकर लोगों को संगम पर इस सिरे से दूसरे सिरे तक श्रद्धालुओं को नाव के पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
वर्जीनिया हिंदू धर्म की गहरी जड़ों पर आश्चर्य चकित हैं। हार्वर्ड विश्विद्यालय के बिजनेस स्कूल का रिसर्च ग्रुप पांच दिन तक कुंभ में 'क्या धरती पर इतना बड़ा आयोजन संभव है' जैसे विषय पर शोध कर वापस जा चुका है।
पायलट बाबा भगवा वस्त्र धारण करने से पहले भारतीय सेना में विंग कमांडर थे। अपनी पूरी पेंशन फौजियों की विधवाओं के लिए दे देते हैं। उनके शिष्य स्वामी आनंद सरस्वती ने रूस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, लेकिन अब अध्यात्म में रच बस गए हैं। कहते हैं, 'आधुनिक परिधान पहन जो पाना था पा लिया, अब गेरुए में उच्चतम पाने की इच्छा है।'
भगवाधारी इलिया अब विष्णु हैं और रूस में 108 मंदिरों की श्रृंखला चलाते हैं। व्लादिमिर ध्यान में मग्न है, अब इसका नाम विवेकानंद गिरी हो गया है।