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मेला रिव्यू-1: गंगा की गोद में बस रेत, विवादित बने महामंडलेश्वर

Sat, 23 Feb 2013 10:43 AM IST
महाकुंभ नगर/अनिल सिद्धार्थ
महाकुंभ नगर/अनिल सिद्धार्थ Updated Sat, 23 Feb 2013 10:43 AM IST
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kumbh review 1: In the lap of ganga just sand, remain disputed mahamandleshwar
संगम की रेती से महाकुंभ के सिरमौर अखाड़े विदा हो गए। वसंत पंचमी के तीसरे शाही स्नान पर्व पर डुबकी के बाद शुरू हुआ विदाई का सिलसिला भी कढ़ी-पकौड़ी के भोग से पूरा हुआ। कोई काशी गया तो कोई हरिद्वार लेकिन अनेक संतों, शंकराचार्यों की ओर से गंगा के मुद्दे पर न कोई सार्थक पहल हुई, न बड़े आंदोलन के संकेत मिले और न ही संतुष्ट करने वाला समाधान ही। गंगा की गोद में बची बस, रेत ही रेत।
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निर्मल-अविरल गंगा के बारे में अखाड़े, प्रशासन को क्लीन चिट देते रहे और मेले के दौरान प्रशासन सिर्फ और सिर्फ वायदों की घुट्टी पिलाता रहा। गंगा महासभा, गंगा सेना, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी अवधेशानंद गिरि, स्वामी चिदानंद सरस्वती मुनिजी, स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती, स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी के शिविरों में गंगा पर चिंतन तो हुए लेकिन उनका कोई नतीजा नहीं निकला। ऐसी कोई लौ नहीं जगी जिसकी रोशनी में गंगा को निर्मलता की राह मिल सके।
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विवादों से शुरू होकर विवादों पर ही महाकुंभ पूरा हुआ। अव्यवस्था से अखाड़ों के भूमि पूजन में देरी हुई तो बारिश की आफत से तारीख से पहले ही वे कूच कर गए। शंकराचार्य चतुष्पथ के विवाद से शुरू महाकुंभ सेक्स स्कैंडल के आरोपी नित्यानंद स्वामी को महामंडलेश्वर बनाने से उपजे विवाद पर खत्म हुआ।
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जूना की ओर से बनाई गई महामंडलेश्वर राधे मां का मुद्दा पूरे मेले के दौरान छाया रहा। राजनीति और विरोध के स्वर के बीच तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा संगम की रेती तक नहीं पहुंच सके। अखाड़़े के महामंडलेश्वरों की ओर से अलग परिषद बनाने की घोषणा के साथ ही जूना के महामंडलेश्वर पायलट बाबा और उनके चौदह महामंडलेश्वर शिष्यों सहित कई प्रमुख महामंडलेश्वरों को अखाड़ों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष का विवाद अदालत के आदेश के बावजूद नहीं थमा। वैरागियों को छोड़कर न संन्यासियों ने उन्हें मान्यता दी, न ही उदासीन और निर्मल ने ही। अखाड़ा परिषद के दोनों गुट अपनी-अपनी जिद पर अड़े। एक भोज के दौरान दोनों के महामंत्रियों ने अपनी-अपनी परिषद को भंग करने की घोषणा की लेकिन महंत ज्ञानदास की ओर से अदालत का आदेश लेकर आने के साथ ही दोनों अपनी-अपनी धूल झाड़ कर फिर खड़े हो गए। और मामला अगले कुंभ तक के लिए टल गया। इन सारे विवादों में गंगा का मुद्दा पीछे ही रह गया। सबने चर्चा की और भूल गए। गंगा को लेकर कोई गंभीर पहल नहीं दिखी।  

‘‘महाकुंभ के दौरान निर्मल गंगा के बारे में देश-विदेश के लोगों में जो जागरूकता बढ़ी है, वह करोड़ों रुपये खर्च करके भी संभव नहीं थी। हालांकि यह सच है कि इस आयोजन का जितना बड़ा लाभ लिया जाना चाहिए था, नहीं लिया जा सका।’’

स्वामी चिदानंद सरस्वती मुनिजी
अध्यक्ष, परमार्थ निकेतन

‘‘जरूरी है कि गंगा को राष्ट्रीय संपदा घोषित किया जाए लेकिन सिर्फ कानून से नहीं प्रत्येक व्यक्ति उसे निर्मल बनाने में जुटे। जहां तक महाकुंभ का सवाल है, गंगा के हिस्से में सिर्फ जय जयकार और नारे ही रहे। निर्मल गंगा के बारे में कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला।’’
स्वामी अवधेशानंद गिरि
आचार्य महामंडलेश्वर जूना
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