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गंगा का आशीष लेकर संगम से विदा हुए कल्पवासी
महाकुंभ नगर/ब्यूरो
Updated Tue, 26 Feb 2013 10:51 AM IST
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माघी पूर्णिमा पर डुबकी के साथ संगम की रेती पर माह भर के कल्पवास को भी पूर्णता मिली। पूर्णिमा पर डुबकी के साथ माह भर का जप, तप, यम, नियम, संयम का संकल्प भी पूरा हुआ।
गंगा मइया के जयकारों के बीच स्नान के बाद शिविर लौटकर उन्होंने अपने तीर्थ पुरोहित और ठाकुर जी को यथाशक्ति भेंट चढ़ाई। फिर तीर्थ पुरोहित और गंगा का आशीष लेकर अपने घरों की ओर लौट गए। बड़ी संख्या में कल्पवासियों ने विदाईऱ् का भंडारा भी किया जिसमें तीर्थ पुरोहित सहित शिविर के लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।
वहीं तमाम ऐसे कल्पवासियों, जिन्हें माह भर घर से दूर रहने के कारण वापसी की जल्दी रही, ने भोर में ही डुबकी लगाने के बाद रेती को प्रणाम कह दिया। पूर्णिमा तिथि भी रविवार आधी रात से ही शुरू हो गई थी। हालांकि सोमवार को दिन में 1.41 बजे तक भद्रा रहने के कारण तमाम श्रद्धालुओं ने दोपहर बाद ही रवानगी की तैयारी की ताकि तब तक भद्रा का प्रभाव खत्म हो जाए।
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वापसी पर शिविरों में मार्मिक दृश्य भी दिखा। अगले बरस फिर मिलने के वायदे के साथ शिविर के साथियों ने एक दूसरे को प्रणाम किया। माह भर साथ रहकर एक-दूसरे का दुख-सुख बांटने वाले कल्पवासियों ने जाते समय एक दूसरे का पता, मोबाइल नंबर भी लिया ताकि एक दूसरे का हाल-चाल मिलता रहे। ज्यादातर कल्पवासियों को लिवाने के लिए उनके घर वाले भी पहुंचे। तैयारियां बीती रात ही पूरी हो गई थीं, सुबह बस डुबकी का इंतजार था सो डुबकी लगी और छोड़ दी रेती।
जौ का पौधा, तुलसी का विरवा विसर्जित
कल्पवास की शुरुआत पर शिविरों के बाहर, जो तुलसी का पौधा और जौ रोपा गया था, उसे पूर्णिमा पर पूजन के बाद विसर्जित कर दिया गया। हालांकि ज्यादातर श्रद्धालु तुलसी का विरवा साथ भी ले गए।
वापसी पर कथा, भंडारा भी
संगम की रेती पर माघ भर रुकने और तीर्थ पुरोहित के शिविर में कथा, भंडारा के बावजूद घर लौटकर भी कल्पवासी श्रीसत्यनारायण की कथा सुनेंगे और परिवार-रिश्तेदारों के बीच भंडारा करेंगे। मान्यता है कि ऐसा करने पर कल्पवास के संकल्प को पूर्णता मिलेगी।
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गंगा मइया के जयकारों के बीच स्नान के बाद शिविर लौटकर उन्होंने अपने तीर्थ पुरोहित और ठाकुर जी को यथाशक्ति भेंट चढ़ाई। फिर तीर्थ पुरोहित और गंगा का आशीष लेकर अपने घरों की ओर लौट गए। बड़ी संख्या में कल्पवासियों ने विदाईऱ् का भंडारा भी किया जिसमें तीर्थ पुरोहित सहित शिविर के लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।
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वहीं तमाम ऐसे कल्पवासियों, जिन्हें माह भर घर से दूर रहने के कारण वापसी की जल्दी रही, ने भोर में ही डुबकी लगाने के बाद रेती को प्रणाम कह दिया। पूर्णिमा तिथि भी रविवार आधी रात से ही शुरू हो गई थी। हालांकि सोमवार को दिन में 1.41 बजे तक भद्रा रहने के कारण तमाम श्रद्धालुओं ने दोपहर बाद ही रवानगी की तैयारी की ताकि तब तक भद्रा का प्रभाव खत्म हो जाए।
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वापसी पर शिविरों में मार्मिक दृश्य भी दिखा। अगले बरस फिर मिलने के वायदे के साथ शिविर के साथियों ने एक दूसरे को प्रणाम किया। माह भर साथ रहकर एक-दूसरे का दुख-सुख बांटने वाले कल्पवासियों ने जाते समय एक दूसरे का पता, मोबाइल नंबर भी लिया ताकि एक दूसरे का हाल-चाल मिलता रहे। ज्यादातर कल्पवासियों को लिवाने के लिए उनके घर वाले भी पहुंचे। तैयारियां बीती रात ही पूरी हो गई थीं, सुबह बस डुबकी का इंतजार था सो डुबकी लगी और छोड़ दी रेती।
जौ का पौधा, तुलसी का विरवा विसर्जित
कल्पवास की शुरुआत पर शिविरों के बाहर, जो तुलसी का पौधा और जौ रोपा गया था, उसे पूर्णिमा पर पूजन के बाद विसर्जित कर दिया गया। हालांकि ज्यादातर श्रद्धालु तुलसी का विरवा साथ भी ले गए।
वापसी पर कथा, भंडारा भी
संगम की रेती पर माघ भर रुकने और तीर्थ पुरोहित के शिविर में कथा, भंडारा के बावजूद घर लौटकर भी कल्पवासी श्रीसत्यनारायण की कथा सुनेंगे और परिवार-रिश्तेदारों के बीच भंडारा करेंगे। मान्यता है कि ऐसा करने पर कल्पवास के संकल्प को पूर्णता मिलेगी।