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महाकुंभः कल्पवास में स्नान, दान करके पाइए मोक्ष

Mon, 28 Jan 2013 08:08 AM IST
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो Updated Mon, 28 Jan 2013 08:08 AM IST
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kalpvas is way of moksha

ट्रैक्टरों पर सवार होकर गोंदरा, ढूढ़ी और रोजमर्रा की जरूरत की चीजें लादकर कुंभ मेला पहुंचे कल्पवासियों का असल मतलब तो आत्म संतुष्टि ही है। रोजमर्रा की चकल्लस से दूर यहां मेला क्षेत्र में एक छोटे से टेंट में एक महीना बिताना आत्मिक और आध्यात्मिक सुख का उनके लिए सबसे बढ़िया साधन है।

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पौषपूर्णिमा से शुरू होकर माघी पूर्णिमा तक चलने वाले कल्पवास में इनकी पूरी दिनचर्या ही बदल जाएगी। एक जून भोजन और एक जून उपवास। सुबह-शाम गंगा स्नान, भजन कीर्तिन और महात्माओं के दर्शन से अर्जित पुण्य लाभ पूरे जीवन के संताप को हरने वाला है।
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जीवन भर की थकान हो जाती है दूर
होलागढ़ से आए रामशिरोमणि पिछले 12 वर्षों से कल्पवास कर रहे हैं। यह उनका दूसरा महाकुंभ है। बताते हैं कि सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर यहां पूरे एक माह बिताना साल भर के लिए नई ऊर्जा भर देता है। स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। हंसराजपुर से आए शिवशंकर पांडेय का शिविर सेक्टर नौ में स्थित है। पिछले चार वर्षों से लगातार कल्पवास करने के लिए आ रहे हैं। उनके लिए कल्पवास का मतलब आत्म संतुष्टि है। बताते हैं कि यहां आने के बाद मानों जीवन भर की थकान उतर जाती है।
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प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील के शिवकुमार मिश्र सपत्नीक पिछले दस वर्षों से कल्पवास कर रहे हैं। बताते हैं कि कल्पवास के दौरान चावल, तिल और गुड़ का दान बेहद पुण्यकारी होता है। यह चीजें वह खासकर अपने घर से लेकर आते हैं। अनंत कुमार मध्यप्रदेश के भोपाल से पहली बार कल्पवास करने आए हैं। सेक्टर आठ में एक तीर्थपुरोहित के यहां उन्होंने किराए पर टेंट लिया है। अनंत बताते हैं कि बुजुर्गों की राय लेकर कुंभ से कल्पवास की शुरूआत की है ताकि अगले कुंभ तक कल्पवास कर शैय्यादान कर सकूं। आगे जैसी ईश्वर की इच्छा।

महाकुंभ से दूर होंगी विकृतियां
देश-विदेश में विकृतियां बढ़ गई हैं। इतिहास, शास्त्र और शिक्षा का अभाव हो गया है। इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए महाकुंभ जैसे आयोजन किए जाते हैं। ये बातें सेक्टर आठ नागवासुकि मार्ग स्थित श्री परमहंस आश्रम में स्वामी अड़गड़ानंद जी ने कहीं।


उन्होंने कहा कि मनोविग्रह के साथ ही प्रकृति और पुरुष का संघर्ष प्रारंभ होता है। गीता आप का धर्मशास्त्र है। भगवान कृष्ण ने बताया है कि गीता अविनाशी योग है। इस अविनाशी योग को सृष्टि के आदि में सूर्य से कहा और सूर्य ने महाराजा मनु से कहा। महाराजा मनु ने अपनी स्मृति में धारण किया और स्मृति परंपरा चलाई।

उन्होंने कहा कि परमात्मा ही सत्य, सनातन और शाश्वत है। गीता के अध्याय दो के 40 श्लोक में भगवान ने बताया है कि योग का अभ्यास कभी नाश नहीं होता।

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