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सब जग होरी ब्रज में होरा
प्रिया गौतम
Updated Mon, 18 Mar 2013 01:13 PM IST
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होली यों एक त्यौहार है पर ब्रज में महोत्सव है- ऐसा महोत्सव जिसमें लोगों के इष्ट आराध्य भी शामिल होते हैं। हर ओर उड़ता अबीर गुलाल और हवा में छाई गर्माहट, पेड़ों से फूटने वाली कोपलों की शीतलता में घुलकर पूरे ब्रज में जैसे भाव और रस का संचार कर देती है।
दुनिया में होली सिर्फ एक दिन मनाई जाती है, लेकिन ब्रज में फाल्गुन आते ही हवा में अबीर, गुलाल उड़ने लगते हैं और ब्रज के गलियारों से लेकर मंदिर तक फाग गूंजने लगता है। बसंत पंचमी के दिन से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। हर चौराहे पर डांढा गढ़ता और फागों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
होली और फाग में राधा भी हैं, श्याम भी है और श्याम के चहेते लोग भी। उनकी भागीदारी में पूरे क्षेत्र में होली की धूम मचनी शुरू हो जाती है।
वैसे तो ब्रज के हर एक मंदिर में होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है और होली तक मंदिरों में बसंती रंगों की बौछार होने लगती है, और भक्त ब्रज रस में सराबोर हो होली के रंगों में रंग जाते हैं। इस पूरे सवा महीने के कार्यक्रम में ब्रज के विभिन्न क्षेत्रों में होली के पर्व पर विशेष आयोजन किए जाते हैं।
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बुलाय गयी राधा प्यारी मथुरा से सैंतालीस किमी दूर बसे राधारानी के गांव बरसाना में राधारानी मंदिर के परिसर में लठामार होली से एक दिन पहले लड्डू होली का आयोजन किया जाता है। इस बार लड्डू होली २० मार्च को मनायी जाएगी। लड्डू होली पर बरसाना गांव में नंदगांव के कान्हा स्वरूप हुरियारे होरी खेलने आते हैं। इस दिन लोग एक दूसरे को जमकर लड्डू बांटते हैं और लुटाते हैं।
अगले दिन शाम चार बजे के बाद मनाई जाने वाली लठामार होली में एक दिन पहले बरसाना आए कृष्ण स्वरूप हुरियारों को बरसाना की लंहगा और ओढ़नी में सजी हुरियारिनें जी भरकर लाठियां भांजती हैं, वहीं नंदगांव के हुरियारे फाग गा-गाकर गोपी स्वरूपा हुरियारिनों को खूब छकाते और उकसाते हैं। वातावरण गुलाल और रंग में नहा उठता है। हर एक उपस्थित जन इस लहर में खो जाता है और चेहरों के बजाय नजर आते हैं बस रंग और गुलाल ।
नंदगांव के कृष्ण कन्हाई बरसाने की राधा गोरी मथुरा से ५४ किमी. दूर श्री कृष्ण के गांव नंदगांव में बरसाने की लठामार होली के एक दिन बाद ही लट्ठमार होली मनाई जाती है।
इस बार २२ मार्च को नंदगांव में लठामार होली होगी। इस दिन बरसाने के हुरियारे नंदगांव में अपना एक झंडा लेकर जाते हैं जिसे बरसाने की हुरियारिनें रोक देती हैं, गोप जबरन घुसते हैं और बस यहीं से इन पर प्रेम में पगी लाठियां बरसने लगती हैं। प्रेमपूर्वक बदला लेने की भावना लिए हुरियारों और हुरियारिनों के बीच की इस मनोहारी नौंकझोंक का अनुपम द्रश्य नंदगांव में ही देखने को मिलता है।
आज पकड़ रंग डारौ री कान्हा मथुरा में वैसे तो बसंत पंचमी से ही होली के उत्सव की धूम पूरे शहर में मचनी शुरू हो जाती है। लेकिन मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान में मनाई जाने वाली होली की अपनी अलग ही पहचान है। समाज गायन के बाद होने वाली श्यामा श्याम की होली में भक्त भी भावविभोर हो नाच उठते हैं और पूरा वातावरण अबीर और गुलाल के उड़ते बादलों से ढक जाता है। इसके अलावा मथुरा के द्वारिकाधीश मंदिर में भी होली की उमंग अपने चरम पर रहती है।
आज नाय छोडुंगी कान्हा सब जग होरी.. ब्रज में होरा की तर्ज पर ब्रज के भिन्न-भिन्न स्थानों पर लठामार होली के बाद रंग खेलनी होली यानि की धुलेड़ी वाले दिन मथुरा से लगभग २२ किमी. दूर बल्देव के दाऊजी मंदिर में हुरंगा का आयोजन किया जाता है। इस बार यह २८ ता. को होगा। इस दिन कृष्ण के बड़े भाई बल्देव जी का डोला निकाला जाता है। हुरंगा में गांव की महिलाएं ,गांव के ही पुरूषों पर पोतना (फटे कपडों का अंटा लगाकर बनाया गया) फटकारती हैं और हुरियारे अपना बचाव करते हुए गीत गाते हैं।
अन्य स्थानों से अलग मथुरा से १२-१३ किमी की दूरी पर स्थित वृंदावन में मनाई जाने वाली होली सर्वाधिक आकर्षक, मनोहारी, उल्लासमयी और आनंदप्रद होती है। यहां आयोजनों से परे श्यामा और श्याम की प्रेमपूर्ण होली मनाई जाती है। बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाने वाली इस होली में भगवान भक्तों के साथ होली खेलते हैं।
चौड़े-चौड़े कलशों में भरा टेसू के फूलों का कुनकुना पानी जब पिचकारियों में भरकर भक्तों पर डाला जाता है तो होली का एक अप्रतिम उत्सव देखने को मिलता है। चारों ओर वातावरण में उड़ता अबीर-गुलाल और हवा में बहती फूलों की मादक खुशबू में जैसे मन डूब जाता है। वृंदावन की यह मनोहारी होली हर मंदिर में मनाई जाती है।
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दुनिया में होली सिर्फ एक दिन मनाई जाती है, लेकिन ब्रज में फाल्गुन आते ही हवा में अबीर, गुलाल उड़ने लगते हैं और ब्रज के गलियारों से लेकर मंदिर तक फाग गूंजने लगता है। बसंत पंचमी के दिन से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। हर चौराहे पर डांढा गढ़ता और फागों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
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होली और फाग में राधा भी हैं, श्याम भी है और श्याम के चहेते लोग भी। उनकी भागीदारी में पूरे क्षेत्र में होली की धूम मचनी शुरू हो जाती है।
वैसे तो ब्रज के हर एक मंदिर में होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है और होली तक मंदिरों में बसंती रंगों की बौछार होने लगती है, और भक्त ब्रज रस में सराबोर हो होली के रंगों में रंग जाते हैं। इस पूरे सवा महीने के कार्यक्रम में ब्रज के विभिन्न क्षेत्रों में होली के पर्व पर विशेष आयोजन किए जाते हैं।
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बुलाय गयी राधा प्यारी मथुरा से सैंतालीस किमी दूर बसे राधारानी के गांव बरसाना में राधारानी मंदिर के परिसर में लठामार होली से एक दिन पहले लड्डू होली का आयोजन किया जाता है। इस बार लड्डू होली २० मार्च को मनायी जाएगी। लड्डू होली पर बरसाना गांव में नंदगांव के कान्हा स्वरूप हुरियारे होरी खेलने आते हैं। इस दिन लोग एक दूसरे को जमकर लड्डू बांटते हैं और लुटाते हैं।
अगले दिन शाम चार बजे के बाद मनाई जाने वाली लठामार होली में एक दिन पहले बरसाना आए कृष्ण स्वरूप हुरियारों को बरसाना की लंहगा और ओढ़नी में सजी हुरियारिनें जी भरकर लाठियां भांजती हैं, वहीं नंदगांव के हुरियारे फाग गा-गाकर गोपी स्वरूपा हुरियारिनों को खूब छकाते और उकसाते हैं। वातावरण गुलाल और रंग में नहा उठता है। हर एक उपस्थित जन इस लहर में खो जाता है और चेहरों के बजाय नजर आते हैं बस रंग और गुलाल ।
नंदगांव के कृष्ण कन्हाई बरसाने की राधा गोरी मथुरा से ५४ किमी. दूर श्री कृष्ण के गांव नंदगांव में बरसाने की लठामार होली के एक दिन बाद ही लट्ठमार होली मनाई जाती है।
इस बार २२ मार्च को नंदगांव में लठामार होली होगी। इस दिन बरसाने के हुरियारे नंदगांव में अपना एक झंडा लेकर जाते हैं जिसे बरसाने की हुरियारिनें रोक देती हैं, गोप जबरन घुसते हैं और बस यहीं से इन पर प्रेम में पगी लाठियां बरसने लगती हैं। प्रेमपूर्वक बदला लेने की भावना लिए हुरियारों और हुरियारिनों के बीच की इस मनोहारी नौंकझोंक का अनुपम द्रश्य नंदगांव में ही देखने को मिलता है।
आज पकड़ रंग डारौ री कान्हा मथुरा में वैसे तो बसंत पंचमी से ही होली के उत्सव की धूम पूरे शहर में मचनी शुरू हो जाती है। लेकिन मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान में मनाई जाने वाली होली की अपनी अलग ही पहचान है। समाज गायन के बाद होने वाली श्यामा श्याम की होली में भक्त भी भावविभोर हो नाच उठते हैं और पूरा वातावरण अबीर और गुलाल के उड़ते बादलों से ढक जाता है। इसके अलावा मथुरा के द्वारिकाधीश मंदिर में भी होली की उमंग अपने चरम पर रहती है।
आज नाय छोडुंगी कान्हा सब जग होरी.. ब्रज में होरा की तर्ज पर ब्रज के भिन्न-भिन्न स्थानों पर लठामार होली के बाद रंग खेलनी होली यानि की धुलेड़ी वाले दिन मथुरा से लगभग २२ किमी. दूर बल्देव के दाऊजी मंदिर में हुरंगा का आयोजन किया जाता है। इस बार यह २८ ता. को होगा। इस दिन कृष्ण के बड़े भाई बल्देव जी का डोला निकाला जाता है। हुरंगा में गांव की महिलाएं ,गांव के ही पुरूषों पर पोतना (फटे कपडों का अंटा लगाकर बनाया गया) फटकारती हैं और हुरियारे अपना बचाव करते हुए गीत गाते हैं।
अन्य स्थानों से अलग मथुरा से १२-१३ किमी की दूरी पर स्थित वृंदावन में मनाई जाने वाली होली सर्वाधिक आकर्षक, मनोहारी, उल्लासमयी और आनंदप्रद होती है। यहां आयोजनों से परे श्यामा और श्याम की प्रेमपूर्ण होली मनाई जाती है। बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाने वाली इस होली में भगवान भक्तों के साथ होली खेलते हैं।
चौड़े-चौड़े कलशों में भरा टेसू के फूलों का कुनकुना पानी जब पिचकारियों में भरकर भक्तों पर डाला जाता है तो होली का एक अप्रतिम उत्सव देखने को मिलता है। चारों ओर वातावरण में उड़ता अबीर-गुलाल और हवा में बहती फूलों की मादक खुशबू में जैसे मन डूब जाता है। वृंदावन की यह मनोहारी होली हर मंदिर में मनाई जाती है।