ताज्जुब है! यहां तो आत्मा खुद कहती है मैं कितना परेशान हूं
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देव भूमि उत्तराखंड में देवी देवताओं से जुड़े कई रहस्य और कथाएं प्रचलित है। लेकिन यहां हम किसी कथा की बात नहीं कर रहे बल्कि उस सच की बात कर रहे हैं जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।
यह कथा है अतृप्त आत्माओं की जो यमलोक और पृथ्वी लोक के बीच कहीं उलझ गए हैं।
पितरों की आत्माओं को मुक्ति
उत्तराखंड में एक प्रथा है, इस प्रथा को गढ़वाल में 'गडयाऊ' नाम से जाना जाता है। इस प्रथा के तहत पांच से सात दिनों का एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
इस प्रथा का आयोजन लोग अपने उन पितरों की आत्माओं को मुक्ति दिलाने के लिए करते हैं, जिनकी मौत किसी दुर्घटना या किसी रहस्यमय तरीके से हो गयी है।
ऐसे अपना दर्द बताती है आत्मा
गड्याऊ में ओजियों (डमरू व मंत्रोच्चार करने वाले व्यक्ति) के आह्वान पर पहले दिन अतृप्त आत्मा माध्यम के तौर पर अपने ही परिवार के किसी व्यक्ति का शरीर चुनती है। इसके बाद सात दिनों तक उस शरीर में आकर नृत्य और गीत के रूप में अपनी व्यथा सुनाती है।
ऐसा माना जाता है कि पहली बार के गडयाऊ में आत्मा अपने परिवार के ही किसी सदस्य पर आती है। इसके बाद अगले छह महीनों तक यह प्रेम आत्मा पर निर्भर करता है कि वह किसके शरीर का चुनाव करेगा।
इसके बाद हर महीने उस पितृ को नचाया जाता है। गडियाऊ का आयोजन छह महीने तक महीने में एक बार किया जाता है। हालांकि ये उस पितृ देवता पर भी निर्भर करता है कि वह नाचना चाहता है या नहीं।
यदि पितृ ने कहा कि उसकी मूर्ति बनाकर उसे उचित स्थान पर स्थापित किया जाए, तो उसकी प्रतिमा बनाकर उसे स्थापित कर दिया जाता है और इस तरह वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
आप वही करते हैं, जो पितृ आपसे करवाना चाहते हैं
टिहरी गढ़वाल के बछणगांव निवासी सुरेश सेमवाल पर उनके पितृ आ चुके हैं। यह बताते हैं कि उनके पिता खच्चरों द्वारा दुकानों के लिए सामाना लाया-ले जाया करते थे।
एक दिन जब वह किबार्श गांव से चीनी के कट्टे लेकर आ रहे थे, तभी उन्हें रास्ते में एक लोमड़ी नजर आई। लोमड़ी को देखकर खच्चर विचलित हो गया और खाई में गिर कर मर गए। इसके बाद सुरेश्ा के पिता गोविंदराम बीमार रहने लगे।
डॉक्टरों को दिखाया भी तो कोई बीमारी पकड़ में नहीं आई। बहुत इलाज के बाद भी वह बच नहीं पाए।
सुरेश पितृ के शरीर पर आने के अनुभव के बारे में बताते हैं कि जब पितृ आपके शरीर में अवतरित होते हैं, तो आपको खुद की सुध नहीं होती आप वही करते हैं, जो पितृ आपसे करवाना चाहते हैं।
जब पितृ आते हैं, तो वह क्षण बहुत भावुक बन जाता है क्योंकि वह अपने परिवार के सभी सदस्यों से गले मिलकर विलाप करता है और स्ाभी की आंखों में आंसु आ जाते हैं।
शोक जैसे हालात बने रहते हैं
इसी गांव के सुनील जोशी कहते हैं, लोग नहीं चाहते कि उनके परिवार में कोई अकाल मृत्यु मरे और पितृ बनकर नाचे। क्योंकि जब भी वह नाचता है, तो सबको रूला देता है।
लगभग सात दिन तक घर में शोक जैसे हालात बने रहते हैं। फिर भी अपने पितृ के लिए इस प्रथा को आज भी मनाया जाता है।