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ताज्जुब है! यहां तो आत्मा खुद कहती है मैं कितना परेशान हूं

Thu, 03 Apr 2014 08:47 AM IST
Updated Thu, 03 Apr 2014 08:47 AM IST
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gadiyau pitri mukti ritual of uttrakhand

देव भूमि उत्तराखंड में देवी देवताओं से जुड़े कई रहस्य और कथाएं प्रचलित है। लेकिन यहां हम किसी कथा की बात नहीं कर रहे बल्कि उस सच की बात कर रहे हैं जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

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यह कथा है अतृप्त आत्माओं की जो यमलोक और पृथ्वी लोक के बीच कहीं उलझ गए हैं।

पितरों की आत्माओं को मुक्ति

gadiyau pitri mukti ritual of uttrakhand

उत्तराखंड में एक प्रथा है, इस प्रथा को गढ़वाल में 'गडयाऊ' नाम से जाना जाता है। इस प्रथा के तहत पांच से सात दिनों का एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

इस प्रथा का आयोजन लोग अपने उन पितरों की आत्माओं को मुक्ति दिलाने के लिए करते हैं, जिनकी मौत किसी दुर्घटना या किसी रहस्यमय तरीके से हो गयी है।

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ऐसे अपना दर्द बताती है आत्मा

gadiyau pitri mukti ritual of uttrakhand

गड्याऊ में ओजियों (डमरू व मंत्रोच्चार करने वाले व्यक्ति) के आह्वान पर पहले दिन अतृप्त आत्मा माध्यम के तौर पर अपने ही परिवार के किसी व्यक्ति का शरीर चुनती है। इसके बाद सात दिनों तक उस शरीर में आकर नृत्य और गीत के रूप में अपनी व्यथा सुनाती है।

ऐसा माना जाता है कि पहली बार के गडयाऊ में आत्मा अपने परिवार के ही किसी सदस्य पर आती है। इसके बाद अगले छह महीनों तक यह प्रेम आत्मा पर निर्भर करता है कि वह किसके शरीर का चुनाव करेगा।

इसके बाद हर महीने उस पितृ को नचाया जाता है। गडियाऊ का आयोजन छह महीने तक महीने में एक बार किया जाता है। हालांकि ये उस पितृ देवता पर भी निर्भर करता है कि वह नाचना चाहता है या नहीं।

यदि पितृ ने कहा कि उसकी मूर्ति बनाकर उसे उचित स्‍थान पर स्‍थापित किया जाए, तो उसकी प्रतिमा बनाकर उसे ‌स्‍थापित कर दिया जाता है और इस तरह वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

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आप वही करते हैं, जो पितृ आपसे करवाना चाहते हैं

gadiyau pitri mukti ritual of uttrakhand

टिहरी गढ़वाल के बछणगांव निवासी सुरेश सेमवाल पर उनके पितृ आ चुके हैं। यह बताते हैं कि उनके पिता खच्चरों द्वारा दुकानों के लिए सामाना लाया-ले जाया करते ‌थे।

एक दिन जब वह किबार्श गांव से चीनी के कट्टे लेकर आ रहे थे, तभी उन्हें रास्ते में एक लोमड़ी नजर आई। लोमड़ी को देखकर खच्चर विचलित हो गया और खाई में गिर कर मर गए। इसके बाद सुरेश्‍ा के पिता गोविंदराम बीमार रहने लगे।

डॉक्टरों को दिखाया भी तो कोई बीमारी पकड़ में नहीं आई। बहुत इलाज के बाद भी वह बच नहीं पाए।

सुरेश पितृ के शरीर पर आने के अनुभव के बारे में बताते हैं कि जब पितृ आपके शरीर में अवतरित होते हैं, तो आपको खुद की सुध नहीं होती आप वही करते हैं, जो पितृ आपसे करवाना चाहते हैं।

जब पितृ आते हैं, तो वह क्षण बहुत भावुक बन जाता है क्योंकि वह अपने परिवार के सभी सदस्यों से गले ‌मिलकर विलाप करता है और स्‍ाभी की आंखों में आंसु आ जाते हैं।

शोक जैसे हालात बने रहते हैं

gadiyau pitri mukti ritual of uttrakhand

इसी गांव के सुनील जोशी कहते हैं, लोग नहीं चाहते कि उनके परिवार में कोई अकाल मृत्यु मरे और पितृ बनकर नाचे। क्योंकि जब भी वह नाचता है, तो सबको रूला देता है।

लगभग सात दिन तक घर में शोक जैसे हालात बने रहते हैं। फिर भी अपने पितृ के लिए इस प्रथा को आज भी मनाया जाता है।

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