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विद्याधाम के चिन्मयानंद बने महामंडलेश्वर
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 25 Jan 2013 04:26 PM IST
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महिला संत से शुरुआत के बाद बृहस्पतिवार को पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी की ओर से सबसे कम उम्र के संत को महामंडलेश्वर की पदवी सौंपकर नया इतिहास रचा गया। छावनी की परंपरा से इतर काली रोड स्थित शिविर में इंदौर के श्रीश्री विद्याधाम के पीठाधीश्वर स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती को ‘चादरविधि’ के तहत वैदिक मंत्रोच्चार के बीच महामंडलेश्वर बनाया गया।
पुरोहितों के स्वास्ति वाचन से श्रीशुद्धि से पट्टाभिषेक के बाद आसन पर बिठाकर जयकारों के बीच अखाड़े के रमता पंचों की ओर से उन्हें चादर ओढ़ाई गई। अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर निरंजनपीठाधीश्वर स्वामी पुण्यानंद गिरि के बाद अखाड़े के सचिवों, श्रीमहंतों और अन्य अखाड़ों के प्रतिनिधियों की ओर से भी चादर ओढ़ाकर उन्हें समर्थन दिया गया। इसी क्रम में उन्होंने अखाड़े की छावनी में आकर आराध्य भगवान कार्तिकेय के विग्रह का पूजन अर्चन करने के बाद ‘पुकार’ में दो लाख 51 हजार रुपये की भेंट चढ़ाई।
कार्यक्रम में रमता पंचों के अतिरिक्त महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद गिरि, स्वामी सोमेश्वरानंद गिरि, स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि, मां आनंदमयी, श्रीमहंत रवींद्र पुरी, महंत नरेंद्र गिरि, महंत रामानंद पुरी, महंत हरगोविंद पुरी, महंत विलकेश्वर गिरि, महंत प्रेमगिरि, महंत केशवपुरी, कोठारी आशीष गिरि, महंत आनंद गिरि सहित बड़ी संख्या में अखाड़े के साधु, श्रद्धालु मौजूद थे। पट्टाभिषेक के बाद भंडारा में सभी ने प्रसाद ग्रहण किया।
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निरंजनी की संख्या पहुंची 75
चिन्मयानंद सरस्वती के साथ ही निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वरों की संख्या 75 पहुंची। प्रयाग कुंभ के पहले निरंजनी के खाते में 73 महामंडलेश्वर थे। यहां पहले स्वामी निर्भयानंद और फिर चिन्मयानंद को महामंडलेश्वर बनाया गया।
वेद, वेदांग, कर्मकांड के ज्ञाता हैं चिन्मयानंद
तकरीबन 25 वर्ष के स्वामी चिन्मयानंद को ‘भगवन’ के रूप में चर्चित गुरु महामंडलेश्वर स्वामी गिरिजानंद सरस्वती ने वर्षों पहले संन्यास की दीक्षा देकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
वह वेद, वेदांग, कर्मकांड और याज्ञिक अनुष्ठान के ज्ञाता हैं। उनके आश्रम में दो सौ विद्यार्थियों को वैदिक कर्मकांड की शिक्षा और चार सौ से ज्यादा गायों का संरक्षण किया जा रहा है।
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पुरोहितों के स्वास्ति वाचन से श्रीशुद्धि से पट्टाभिषेक के बाद आसन पर बिठाकर जयकारों के बीच अखाड़े के रमता पंचों की ओर से उन्हें चादर ओढ़ाई गई। अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर निरंजनपीठाधीश्वर स्वामी पुण्यानंद गिरि के बाद अखाड़े के सचिवों, श्रीमहंतों और अन्य अखाड़ों के प्रतिनिधियों की ओर से भी चादर ओढ़ाकर उन्हें समर्थन दिया गया। इसी क्रम में उन्होंने अखाड़े की छावनी में आकर आराध्य भगवान कार्तिकेय के विग्रह का पूजन अर्चन करने के बाद ‘पुकार’ में दो लाख 51 हजार रुपये की भेंट चढ़ाई।
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कार्यक्रम में रमता पंचों के अतिरिक्त महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद गिरि, स्वामी सोमेश्वरानंद गिरि, स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि, मां आनंदमयी, श्रीमहंत रवींद्र पुरी, महंत नरेंद्र गिरि, महंत रामानंद पुरी, महंत हरगोविंद पुरी, महंत विलकेश्वर गिरि, महंत प्रेमगिरि, महंत केशवपुरी, कोठारी आशीष गिरि, महंत आनंद गिरि सहित बड़ी संख्या में अखाड़े के साधु, श्रद्धालु मौजूद थे। पट्टाभिषेक के बाद भंडारा में सभी ने प्रसाद ग्रहण किया।
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निरंजनी की संख्या पहुंची 75
चिन्मयानंद सरस्वती के साथ ही निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वरों की संख्या 75 पहुंची। प्रयाग कुंभ के पहले निरंजनी के खाते में 73 महामंडलेश्वर थे। यहां पहले स्वामी निर्भयानंद और फिर चिन्मयानंद को महामंडलेश्वर बनाया गया।
वेद, वेदांग, कर्मकांड के ज्ञाता हैं चिन्मयानंद
तकरीबन 25 वर्ष के स्वामी चिन्मयानंद को ‘भगवन’ के रूप में चर्चित गुरु महामंडलेश्वर स्वामी गिरिजानंद सरस्वती ने वर्षों पहले संन्यास की दीक्षा देकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
वह वेद, वेदांग, कर्मकांड और याज्ञिक अनुष्ठान के ज्ञाता हैं। उनके आश्रम में दो सौ विद्यार्थियों को वैदिक कर्मकांड की शिक्षा और चार सौ से ज्यादा गायों का संरक्षण किया जा रहा है।