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रास बिहारी लै रह्ये रसिया कौ आनंद
मथुरा/रैना पालीवाल
Updated Mon, 18 Mar 2013 12:46 PM IST
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ब्रज ऐ फाग कौ रंग चढ़ गयौ है। ब्रजवासी ही नहीं बिनकौ छैला ऊ रसिया कौ रस लै रह्यो है। बल्लभ कुल के मंदिरन मै ठाकुर जी ऐ फागुन की अनुभूति करायवे कू राजभोग में रसिया गाए जाय रहे हैं।
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ब्रज की होली श्यामा श्याम के रंग रंगी है। या होली कौ नायक अपनौ कान्हा है। या मारे द्वारिकाधीश मंदिर मै वाय रसिया सुनाय कै होरी कू तैयार करौ जाय रह्यो है।
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सुबह 10 बजते ही ढप बजवौ शुरू है जावै। छोटेलाल अपनी मधुर वाणी ते रसिया कौ रस उड़ेलैं। होरी खेल लै गुजरिया, खेल लै रंगीली होरी खेल लै... रसिया की गूंज ते मंदिर में आनंद छा जावै।
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रसिया गायक छोटे लाल ने बताया कि फागुन मास लगते ही मंदिर में रसिया गायन शुरू हो जाता है। सुबह 10-11 बजे तक राजभोग में ठाकुर जी को रसिया सुनाया जाता है। यह परंपरा बरसों से चली आ रही है। हम मंदिर में ही रसिया की सेवा करते हैं।
द्वारिकाधीश मंदिर के पीआरओ राकेश चतुर्वेदी ने कहा कि पुरानी कहावत है ‘सब जग होरी, ब्रज में होरा’। 26 फरवरी से फागुन लगते ही मंदिर में रसिया गायन शुरू हो गया है जो पूर्णमासी तक चलेगा।
गोपाल पीठ, पापड़ वाली गली में भी छोटू बाबा, लाला बाबा और विजय जी बड़े चौबे रसिया गाते हैं। बल्लभ कुल के अन्य मंदिर छोटे मदन मोहन, राम घाट, बड़े मदन मोहन, राम घाट आदि में भी यह परंपरा निभाई जा रही है।
सूरदास गा रहे होरी
लोग उन्हें सूरदास ही कहते हैं। पिछले 20 सालों से वह द्वारिकाधीश मंदिर में समाज गायन कर रहे हैं। नेत्रहीन सुकेश चतुर्वेदी पखावज भी बजाते हैं और गाते भी हैं। बसंत के बाद से शुरू हुए समाज गायन में होरी के पद गाए जाते हैं। अष्टछाप कवियों के पदों को ही प्रमुखता दी जाती है।
बहुत जोर देने पर सुकेश सुनाते हैं, ‘ननदिया होरी खेलन दै, जो मांगैगी, सोई दऊंगी, फागुन मै जस लै...’। सुकेश कहते हैं कि अपने ठाकुर जी के लिए गाने की अनुभूति बहुत सुखद है। अब यहां से कहीं जाने का मन ही नहीं करता।