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कड़ी तपस्या से कम नहीं अखाड़े का तपस्वी बनना

Thu, 31 Jan 2013 11:09 AM IST
महाकुंभ नगर/अमर उजाला ब्यूरो
महाकुंभ नगर/अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 31 Jan 2013 11:09 AM IST
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being a priest of akhada is tougher than austerity
कुंभ में आए अखाड़ों में तपस्वी बनना कड़ी तपस्या से कम नहीं है। ऐसे तमाम तपस्वी मिल जाएंगे जो कई साल से खड़े हैं, मौन व्रत पर हैं या पूरी तरफ से फलाहारी हैं लेकिन तपस्या सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं। किसी अखाड़े  का पुजारी बनना भी तपस्या से कम नहीं। सुबह चार बजे उठकर स्नान करना, खुद गंगाजल लाना और पूजा-पाठ संपन्न कराने के बाद दिनभर मंदिर की रखवाली करना। समाज से अलग-थलग इन पुजारियों की पूरी दुनिया उनके अखाड़े में ही समाहित होती है।
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वैसे तो अखाड़ों में तमाम पद होते हैं लेकिन पुजारी के पद पर बने रहने के लिए बड़ी तपस्या करनी पड़ती है। भूलकर भी किसी ने छू लिया तो पुजारी को तुरंत स्नान करना पड़ता है। किसी ने बीस दफे छुआ तो पुजारी उतनी बार स्नान करेंगे। वह दूसरों से कुछ नहीं कहेंगे। खुद को ही कष्ट देंगे। पुजारी के लिए प्रतिदिन सुबह चार बजे उठकर स्नान करना अनिवार्य है। वह प्रतिदिन गंगाजल लेने खुद जाते हैं। पुजारी और गंगाजल की सुरक्षा के लिए एक कोतवाल भी साथ जाता है।
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पुजारी किसी दूसरे अखाड़े में भोजन तक नहीं करते। वह अपने अखाड़े  की रसोई में बना भोजन ही प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं। यहां तक कि किसी दूसरे की तरफ से दिया गया प्रसाद भी पुजारी स्वीकार नहीं करते। आखिर उन्हें इतने अनुशासन में क्यों रहना पड़ता है? वह समाज से अलग-थलग क्यों पड़े रहते हैं? अखाड़ों से जुड़ी एक मान्यता में इन तमाम सवालों के जवाब मिल जाएंगे।
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तपोनिधि आनंद अखाड़ा के थानापति भैरोगिरि जी महाराज बताते हैं कि आवाहन (सरकार), अटल (बादशाह) और आनंद (पुजारी) अखाड़े  का इतिहास सबसे पुराना है। मुगलकालीन शासन में एक मुगल शासक ने जूनागढ़ में तीन अखाड़ों के हजारों साधु-संतों के प्रसाद में जहर मिला दिया था। उस वक्त सिर्फ दो संत बचे, जिनमें आनंद के पुजारी और आवाहन के भालाधारी शामिल थे। धर्म की रक्षा के लिए आनंद के एक संत भस्म का गोला और आवाहन के एक संत भाला लेकर वहां से भागे।


पुजारी और भालाधारी ने प्रसाद नहीं खाया, सो वे बच गए। पुजारी आज भी किसी दूसरे का दिया प्रसाद ग्रहण नहीं करते। थानापति के मुताबिक जूनागढ़ के ढोलका, धंधूका और वीरमगांव में अब भी हजारों साधु-संतों की समाधि बनी है। संतों के श्राप के कारण इन गांवों में जमीन के नीचे से गरम पानी निकलता है। साधु-संत इन गांवों में भोजन और पानी ग्रहण नहीं करते।

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