एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा
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पांच राज्यों का चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसी के साथ अब वह एनडीए का भी हिस्सा नहीं है। कुशवाहा के इस मोह भंग का अनुमान जुलाई 2017 से लग रहा था और इसे अब उन्होंने अंजाम तक पहुंचाया है। इसकी पीछे की बड़ी वजह नीतीश कुमार और कुशवाहा के रिश्तों का समीकरण है। दोनों एक दूसरे को फूटी आंख पसंद नहीं करते।
कुशवाहा राजनीति में 1980 के दशक में आए थे। वह 1985-88 तक बिहार में युवा लोकदल के महासचिव थे। 1988-93 युवा जनता दल के राष्ट्रीय महासचिव रहे। 1994 में वह समता पार्टी का हिस्सा बन गए और 2002 तक पार्टी के महासचिव रहे। 2000-05 तक वह बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। 2005 में सुशील कुमार मोदी के लोकसभा सदस्य बनने के बाद कुशवाहा बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता बन गए। यहां से उनका उभार शुरू हुआ।
लव-कुश बने नीतीश-कुशवाहा
राजनीति में अवसर का बड़ा महत्व है। बिहार की राजनीति की फिर स्क्रिप्ट लिखी गई। कुशवाहा पर नीतीश ने डोरे डाले और कुशवाहा की जरूरत भी थी। 31 अक्टूबर 2009 को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुशवाहा की तरफ फिर चारा फेंका और उपेंद्र कुशवाहा जद(यू) में लौट आए। अगले साल जद(यू) ने 2010 में कुशवाहा को राज्य सभा भेजा।
इसे नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा की कहीं राम-लक्ष्मण की तो कही लव-कुश की जोड़ी बताई गई। कुशवाहा ने खुद की छवि बनानी शुरू की। कोइरी समाज कीराजनीति को धार देने लगे। कुशवाहा की इसी महत्वाकांक्षा में फिर नीतीश कुमार और कुशवाहा में टकराव हुआ। उपेंद्र कुशवाहा ने 2013 में जद(यू) से अलग होकर राष्ट्रीय समता पार्टी बना ली। वह एक बार फिर नीतीश कुमार के खिलाफ मुखर होने लगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने के बाद कुशवाहा ने भाजपा की तरफ देखना शुरू किया। इधर नीतीश कुमार की पार्टी जद(यू) ने भाजपा से नाता तोड़ते हुए खुद को एनडीए से अलग कर लिया। नीतीश कुमार और कुशवाहा फिर एक दूसरे के खिलाफ कुछ ज्यादा मुखर हो गए।
नीतीश से बिगाड़
2005 में ही हुए विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा चुनाव हार गए। जबकि भाजपा और जद(यू) की सीटें बढ़ गईं। सरकार बनी तो नीतीश कुमार ने सरकार में कुशवाहा को कोई पद नहीं दिया। दरअसल कुशवाहा कोइरी समाज से हैं और नीतीश कुमार कुर्मी। इसके बाद कुशवाहा ने जद(यू) छोड़ दी।
वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में चले गए। इसके बाद कुशवाहा ने नीतीश कुमार की आलोचना तेज कर दी। वह कोइरी (कुशवाहा) समाज को एकजुट करने में जुट गए। बिहार में कोइरी 5-6 प्रतिशत बताए जाते हैं। कुर्मी 2-3 प्रतिशत ही हैं। हालांकि नीतीश कुमार के पास कुर्मी के अलावा अन्य जातियां भी हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव -2015
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नए समीकरण गढ़े। उन्होंने राम विलास पासवान की लोजपा, जीतन राम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के साथ कांग्रेस-राजद-जद(यू) के गठजोड़ वाले महागठबंधन को चुनौती देने की ठानी, लेकिन नीतीश कुमार के चेहरे और लालू प्रसाद यादव की राजद के सामाजिक समीकरण में एनडीएगठबंधन को करारा झटका लगा। इसके बाद जुलाई 2017 में भाजपा और जद(यू) करीब आ गए। तभी से अनुमान लगाया जा रहा था कि जल्द ही कुशवाहा की पार्टी खुद को एनडीए से अलग कर सकती है।
भाजपा-जद(यू) ने नहीं खोले थे पत्ते
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नजदीकी रिश्ते तथा नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री मोदी से बन रहे समीकरण को देखकर कुशवाहा लगातार खुद को लेकर आशंकित रहे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की 2018 में सीटों के बंटवारे को लेकर नीतीश कुमार से बातचीत ने भी कुशवाहा को परेशान किया।
कुशवाहा इस दौरान राजद के नेताओं के संपर्क में भी बने रहे। बताते हैं शाह और नीतीश कुमार इससे सहमत थे कि कुशवाहा एनडीए में नहीं रहेंगे। इसलिए सीटों की संख्या और बंटवारा कुछ समय के लिए टाल दिया जाए। दोनों ही दलों ने सीटों के बंटवारे पर अपने पत्ते नहीं खोले।
उधर भाजपा ने कुशवाहा से संवाद भी एक तरह से एकतरफा कर लिया। लिहाजा कुशवाहा को अपनी राह चुननी पड़ी। बताते हैं इसमें भी नीतीश कुमार की ही अहम भूमिका रही। भाजपा अध्यक्ष का भी मानना है कि जातिगत समीकरण के लिहाज से कुशवाहा राज्य में एक-दो लोकसभा सीटों से अधिक के लायक नहीं है।