भाजपा करेगी मंथन, निगम चुनाव में क्यों हुआ पार्टी का सूपड़ा साफ
- दिल्ली नगर निगम के लिए हुए पांच सीटों के उपचुनाव में एक भी सीट पर जीत हासिल करने में नाकाम रही भाजपा, चार पर आम आदमी पार्टी तो एक पर कांग्रेस को मिली जीत
- अरविंद केजरीवाल की राजनीति की काट खोज पाने में लगातार नाकाम रही भाजपा, आप के बढ़ते प्रभाव से चिंता में पड़ गई पार्टी
विस्तार
दिल्ली नगर निगमों की पांच सीटों पर हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी ने चार सीटों पर जीत हासिल की तो कांग्रेस ने भी एक सीट पर जीत हासिल कर अपनी वापसी का संकेत दिया है। लेकिन अरविंद केजरीवाल की राजनीति के सामने भाजपा एक बार फिर चारों खाने चित हो गई और उपचुनाव में एक भी सीट पर जीत हासिल करने में नाकाम रही। माना जा रहा है कि इन उपचुनावों का निगमों के मुख्य चुनावों पर भी असर पड़ेगा, लिहाजा निगमों की अपनी 15 साल की सत्ता को बचाने के लिए पार्टी अभी से चिंता में पड़ गई है। उपचुनावों के परिणामों को लेकर पार्टी शीघ्र ही आत्ममंथन करेगी और मुख्य चुनावों की रणनीति तैयार करेगी।
केंद्रीय नेता भी असहज
दिल्ली नगर निगम उपचुनावों में हुई करारी हार पर भाजपा नेताओं को कोई जवाब नहीं सूझ रहा है। कई नेता इन मुद्दों पर कोई टिप्पणी करने से बचते नजर आ रहे हैं। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गुजरात के पंचायत चुनावों में पार्टी को मिली जीत को किसानों और मजदूरों की जीत अवश्य बताया, लेकिन जब दिल्ली उपचुनाव के नतीजों पर उनसे टिप्पणी मांगी गई तो वे असहज हो गए। अंततः नेता ने यही कहा कि उपचुनाव में जिसकी सीटें जिसके पास थीं उसके पास चली गईं (उपचुनाव की पांच में से चार सीटें पहले से आम आदमी पार्टी के पास थीं)। लेकिन नेता ने इस पर कोई सीधी टिप्पणी करने से दूरी ही बरती।
मुफ्त योजनाओं की कोई काट नहीं
दिल्ली भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला से कहा कि यह सच्चाई है कि आम आदमी पार्टी की मुफ्त बिजली, पानी और बसों में महिलाओं को मिल रहे मुफ्त सफर की सुविधा जैसी योजनाओं की कोई काट देने में पार्टी नाकाम रही है। विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कई लुभावने वायदे किए थे, लेकिन उन पर हम जनता को भरोसा दिलाने में नाकाम रहे। पार्टी के पार्षदों पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे, लेकिन इसकी कोई काट पार्टी नहीं खोज सकी जिसके कारण जनता के बीच उसकी छवि खराब हुई और उसका परिणाम भुगतना पड़ा।
नेता ने कहा कि एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते भाजपा इस तरह की लोकलुभावनी नीतियों की घोषणा नहीं कर सकती है। अगर वह एक राज्य में इस तरह की कोई घोषणा करती है, तो दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की मांग उठेगी जिसका सामना करना पार्टी के लिए मुश्किल हो जाएगा। वहीं, आम आदमी पार्टी के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और वह कुछ भी वायदा कर सकते हैं। लेकिन इस तरह के वायदे दिल्ली जैसे छोटे राज्यों में तो संभव हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश या बिहार जैसी भारी आबादी वाले राज्यों में इस तरह की लोकलुभावनी नीतियों को लागू करना संभव नहीं है।
पार्टी ने नगर निगमों के दिल्ली सरकार पर बकाया 2600 करोड़ रुपये के फंड को लेकर पार्टी ने इतना हंगामा खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन उसके बाद भी निगम कर्मचारियों को भुगतान न हो पाने या सफाई कर्मचारियों के हड़ताल के कारण सार्वजनिक जगहों पर फैली गंदगी के लिए जनता ने भाजपा को ही जिम्मेदार माना। इसी का नतीजा है कि निगम चुनावों में पार्टी की करारी हार हुई।
दिल्ली नगर निगम में उच्च पद पर रह चुके भाजपा के एक अन्य नेता ने कहा कि उपचुनाव में हमारे पास किसी एक जिताऊ मुद्दे का सर्वथा अभाव था। पार्टी इसे एक सामान्य चुनाव की तरह लड़ती रही, जबकि आम आदमी पार्टी के पास केजरीवाल की मुफ्त की स्कीमों के अलावा भाजपा के पार्षदों पर भ्रष्टाचार का हथियार था। पार्टी इसका मुकाबला करने में पार्टी नाकाम रही।
केंद्र सरकार ने दिल्ली की भलाई के लिए काफी काम किया है। भारत वंदना पार्क, पेरीफेरल सड़कों, प्रगति मैदान में भारी निवेश कर वर्ल्ड क्लास इंटीग्रेटेड एग्जीबिशन कम कन्वेंशन सेंटर बनाने, कच्ची कालोनियों को पक्का करने या अन्य भारी-भरकम लागत वाली योजनाओं में निवेश, पार्टी जनता से इन मुद्दों पर समर्थन हासिल करने में बुरी तरह नाकाम हुई है।
कांग्रेस की वापसी से लंबे समय बाद पार्टी के प्रदेश कार्यालय पर जश्न मनाया गया। कांग्रेस के इस जन पर भाजपा की भी निगाह टिकी हुई है। पार्टी के एक नेता के मुताबिक, अगर कांग्रेस मुस्लिम वोटरों के साथ अपने कोर वोटरों में वापसी करती है तो भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है।
नेता ने माना कि इन उपचुनाव के नतीजों का मुख्य चुनावों पर भी असर पड़ेगा। अगर पार्टी एक साल के अंदर कोई ठोस योजना जनता के सामने नहीं पेश कर पाती है तो उसको निगम चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। इसके पहले हुए तीन विधानसभा चुनावों में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सघन प्रचार रणनीति के बावजूद भाजपा केजरीवाल को रोकने में नाकाम रही है।