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रूस-चीन की तुलना में फिसड्डी हैं भारतीय स्कूली बच्चे, रिसर्च में हुआ शर्मनाक खुलासा
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Updated Mon, 06 Aug 2018 11:14 PM IST
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स्कूल छात्र
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देशभर के सभी स्कूलों का पाठ्यक्रम अप टू दि मार्क (ठीक) नहीं है। प्रोफेशनल कोर्स करने वाले स्कूली बच्चे कॉलेज पहुंचते ही भ्रमित हो जाते हैं। ऐसे में स्कूलों का पाठ्यक्रम बदलने की जरूरत है। सोमवार को नॉलेज पार्क स्थित शारदा विश्वविद्यालय में आए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के वाइस चेयरमैन डॉ. एमपी पूनिया ने यह बात कही।
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उन्होंने बताया कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कराए सर्वे में रूस, चीन, जापान जैसे देशों के स्कूलों का करिकुलम (पाठ्यक्रम) भारत के स्कूलों से काफी बेहतर पाया गया, जिससे अन्य देशों के स्कूली बच्चों की तुलना में भारत के स्कूली बच्चे कम जानकार हैं। हालांकि, देश में कॉलेज के बच्चे फिर भी बेहतर हैं लेकिन अन्य देशों के मुकाबले पीछे हैं।
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डॉ पूनिया ने कहा कि समस्या से निपटने के लिए मॉडल करिकुलम बनाने की जरूरत है। उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों से एआईसीटीई के इंफ्रास्ट्रक्चर पोर्टल में शामिल होकर एक करिकुलम अपनाने के लिए कहा। एआईसीटीई पाठ्यक्रम का संशोधन, शिक्षक प्रशिक्षण, इंडक्शन प्रोग्राम, नवाचार और स्टार्टअप को बढ़ावा देना, इंटर्नशिप नीति, परीक्षा पैटर्न, दृष्टिकोण योजना लेकर आ रही है। हमें छात्रों को डिग्री होल्डर से ज्यादा स्किल्ड और नॉलेज होल्डर बनाना चाहिए। कोर्स ऐसा होना चाहिए कि छात्रों का तनाव कम रहे। उन्होंने स्टॉर्टअप को बढ़ावा देने के लिए कहा कि युवा छात्र गांवों में जाकर समस्याओं का समाधान करें और नौकरी पाने के बजाए नौकरी बनाएं। उन्होंने शारदा विश्वविद्यालय के विभिन्न विभाग की फैकल्टी तथा शोध छात्रों के साथ बातचीत की और अपना अनुभव साझा किया।
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- शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षित करने पर जोर
डॉ. एमपी पूनिया ने बताया कि शिक्षकों को भी नए करिकुलम के बारे में जानकारी होनी चाहिए, जिससे छात्रों को ठीक से शिक्षित कर सकें। इसके लिए नए शिक्षकों को प्रशिक्षण मिलते रहना चाहिए। कॉलेजों को अधिकारिक मान्यता के समय यह पहलू ध्यान में रखा जाएगा कि नए शिक्षकों को क्या सिखाया गया।
- अगले सत्र में हो सकती है कंबाइंड इंजीनियरिंग परीक्षा
मेडिकल की ‘नीट’ प्रवेश परीक्षा की तरह इंजीनियरिंग की एक कंबाइंड प्रवेश परीक्षा अगले सत्र में हो सकती है। इस वर्ष देश के दो राज्यों तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सहमति नहीं मिली है। अगले सत्र तक इनके मानने तक सहमति मिलने के आसार हैं।