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Teacher's Day 2018: फादर ने कहा, हिंदी में बोलो
डॉ. उषा अरोड़ा, अलीगढ़
Updated Fri, 07 Sep 2018 12:41 PM IST
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teacher
बात बहुत पुरानी है, लेकिन आज भी जीवंत है। हिंदी में एम.ए. करने के बाद मैं शोध के लिए फादर कामिल बुल्के के पास रांची गई। शोध के लिए मेरा पंजीकरण हो गया। फादर किताबें घर के लिए नहीं देते थे। इस कारण वहीं पर पढ़ने के लिए घंटो बैठती। फादर से बहुत कुछ जाने- अनजाने सीखा कि अध्ययन क्या होता है? उनकी लगन और निष्ठा मुझे कई बार आश्चर्य चकित कर देती थी। अभी शोध का पहला वर्ष ही था कि मेरी शादी जयपुर में एक इंजीनियर से तय हो गई। मैं बहुत परेशान थी कि मेरा अध्ययन क्रम छूट जाएगा और मैं शोध पूरा नहीं कर पाऊंगी। इस बात को मैं अक्सर फादर से कहती। वह मुस्कुराते हुए कहते, "तुम चिंता मत करो, अध्ययन करती रहो, तुममें लगन है तुम कर लोगी।"
अध्ययन करते समय उनका यह वाक्य मुझे निरंतर प्रेरणा देता था। दिन बीतते गए और एक दिन मेरी शादी हो गई। मैं अपने पति को फादर से मिलाने ले गई। मेरे पति ने देखा, एक पादरी सफेद चोगा पहने बैठे हैं। मुस्कुराते हुए उन्होंने मेरे पति को कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। सहजता से इन्होंने अंग्रेजी में बातचीत शुरू की। बात शुरू होते ही फादर ने इन्हें तुरंत रोका और पूछा, "क्या तुम हिंदी नहीं जानते?" मेरे पति ने उत्तर दिया, "हां फादर जानता हूं।"
फादर ने कहा "मैं विदेशी दिखाई देता हूं, पर विदेशी नहीं हूं। मुझसे हिंदी में बात करो। मेरी हिंदी सक्षम है, समृद्ध है, जितनी सहज, सरल और सुंदर अभिव्यक्ति हिंदी में हो सकती है, उतनी किसी अन्य भाषा में नहीं। हिंदी में सब कुछ कहा जा सकता है। यह एक साहित्यिक और वैज्ञानिक भाषा है। हमारी सोच ही हमारी हिंदी को महत्व नहीं देती। हम हिंदी वाले ही हिंदी का सम्मान नहीं करते।" एक विदेशी की हिंदी के प्रति लगन और निष्ठा ने मुझे आंदोलित कर दिया।
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हिंदी के सच्चे पुजारी के प्रति मैं नत मस्तक हो गई। पहली बार आभास हुआ कि हिंदी में एम.ए. में मैंने भले ही प्रथम स्थान प्रप्त किया हो, पर हिंदी की गरिमा और उसका महत्व फादर ने मुझे उस दिन समझा दिया। तब से मुझे हिंदी प्रेमियों से एक विशेष लगाव हो गया। अब हमेशा हिंदी में हस्ताक्षर करती हूं, हिंदी बोलती हूं। हिंदी बोलने वालों के प्रति सम्मान का भाव है। जब फादर के चरण स्पर्श कर जयपुर जाने के लिए विदा लिया, तब फादर ने मुझे कुछ किताबों की सूची दी और अपने अंग्रेजी- हिंदी कोष की एक प्रति देते हुए बोले, “ये उपहार है।” गीली पलकों से विदा लेते हुए हिंदी के सच्चे पुजारी के प्रति मन स्वतः भावविभोर हो उठा। मैं इस लगन से काम करती हूं कि अपनी हिंदी को गौरवान्वित स्थान दिला सकूं।
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अध्ययन करते समय उनका यह वाक्य मुझे निरंतर प्रेरणा देता था। दिन बीतते गए और एक दिन मेरी शादी हो गई। मैं अपने पति को फादर से मिलाने ले गई। मेरे पति ने देखा, एक पादरी सफेद चोगा पहने बैठे हैं। मुस्कुराते हुए उन्होंने मेरे पति को कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। सहजता से इन्होंने अंग्रेजी में बातचीत शुरू की। बात शुरू होते ही फादर ने इन्हें तुरंत रोका और पूछा, "क्या तुम हिंदी नहीं जानते?" मेरे पति ने उत्तर दिया, "हां फादर जानता हूं।"
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फादर ने कहा "मैं विदेशी दिखाई देता हूं, पर विदेशी नहीं हूं। मुझसे हिंदी में बात करो। मेरी हिंदी सक्षम है, समृद्ध है, जितनी सहज, सरल और सुंदर अभिव्यक्ति हिंदी में हो सकती है, उतनी किसी अन्य भाषा में नहीं। हिंदी में सब कुछ कहा जा सकता है। यह एक साहित्यिक और वैज्ञानिक भाषा है। हमारी सोच ही हमारी हिंदी को महत्व नहीं देती। हम हिंदी वाले ही हिंदी का सम्मान नहीं करते।" एक विदेशी की हिंदी के प्रति लगन और निष्ठा ने मुझे आंदोलित कर दिया।
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हिंदी के सच्चे पुजारी के प्रति मैं नत मस्तक हो गई। पहली बार आभास हुआ कि हिंदी में एम.ए. में मैंने भले ही प्रथम स्थान प्रप्त किया हो, पर हिंदी की गरिमा और उसका महत्व फादर ने मुझे उस दिन समझा दिया। तब से मुझे हिंदी प्रेमियों से एक विशेष लगाव हो गया। अब हमेशा हिंदी में हस्ताक्षर करती हूं, हिंदी बोलती हूं। हिंदी बोलने वालों के प्रति सम्मान का भाव है। जब फादर के चरण स्पर्श कर जयपुर जाने के लिए विदा लिया, तब फादर ने मुझे कुछ किताबों की सूची दी और अपने अंग्रेजी- हिंदी कोष की एक प्रति देते हुए बोले, “ये उपहार है।” गीली पलकों से विदा लेते हुए हिंदी के सच्चे पुजारी के प्रति मन स्वतः भावविभोर हो उठा। मैं इस लगन से काम करती हूं कि अपनी हिंदी को गौरवान्वित स्थान दिला सकूं।