{"_id":"5bbaeeff867a5514af12a405","slug":"know-how-too-much-politeness-can-kill-your-reputation","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"क्या आप जानते हैं जरूरत से ज्यादा विनम्र स्वभाव आपकी छवि खराब कर सकता है, पढ़ें ये खबर","category":{"title":"Stress Management ","title_hn":"रहिए कूल","slug":"stress-management"}}
क्या आप जानते हैं जरूरत से ज्यादा विनम्र स्वभाव आपकी छवि खराब कर सकता है, पढ़ें ये खबर
बीबीसी
Updated Mon, 08 Oct 2018 11:15 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गुरूर, घमंड, अभिमान...हर समाज और संस्कृति में ये शब्द विलेन माने जाते हैं। हम सब को बचपन से ही विनम्र होने की सीख दी जाती है। अंग्रेज लेखिका जेन ऑस्टेन ने तो इस पर बाकायदा उपन्यास लिखा था-प्राइड ऐंड प्रेजुडिस। इसके जमींदार किरदार मिस्टर डार्सी को अपनी प्रेमिका एलिजाबेथ बेनेट का प्यार हासिल करने के लिए अपने गुरूर की क़ुर्बानी देनी पड़ी थी। मगर, वक़्त बदल रहा है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि अभिमान करना उतनी भी बुरी बात नहीं जितनी सदियों से बताई जाती रही है। पिछले कुछ बरसों में हुए रिसर्च बताते हैं कि इंसान के विकास में अभिमान का अहम रोल रहा है। ये खूबी इंसान में यूं ही नहीं आ गई। इसका मकसद है। तभी तो, आप पूरब से पश्चिम हो या बच्चों से बुज़ुर्ग तक- अभिमान की झलक देख पाते हैं।
गुरूर के संकेत तो आप को पता ही हैं। सीधे अकड़ कर खड़े होना, बांहें फैला कर बातें करना, हमेशा सिर ऊंचा रखना। ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक जेसिका ट्रेसी ने इस बारे में किताब लिखी है- 'प्राइड:द सीक्रेट ऑफ सक्सेस'। वो कहती हैं कि "अकड़ वाली इस भाव-भंगिमा को इंसान ने सदियों की विकास यात्रा से गुजर कर हासिल किया है। ये यूं ही नहीं आई है।" जब हम अपनी किसी उपलब्धि पर गर्व करते हैं, तो इसके सामाजिक फायदे भी होते हैं।
विज्ञापन
गुरूर के संकेत तो आप को पता ही हैं। सीधे अकड़ कर खड़े होना, बांहें फैला कर बातें करना, हमेशा सिर ऊंचा रखना। ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक जेसिका ट्रेसी ने इस बारे में किताब लिखी है- 'प्राइड:द सीक्रेट ऑफ सक्सेस'। वो कहती हैं कि "अकड़ वाली इस भाव-भंगिमा को इंसान ने सदियों की विकास यात्रा से गुजर कर हासिल किया है। ये यूं ही नहीं आई है।" जब हम अपनी किसी उपलब्धि पर गर्व करते हैं, तो इसके सामाजिक फायदे भी होते हैं।
विज्ञापन
गर्व करने का भी मकसद होता है
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की लेडा कॉस्माइड्स कहती हैं "जब इंसान शिकार कर के बसर करता था, तो गर्व करने का मकसद ये संकेत देना होता था कि आप की बेहतरी सब के हित में है।"लेडा की रिसर्च में पता चला है कि हम तब गुरूर महसूस करते हैं, जब हम कोई मुश्किल काम निपटाते हैं या फिर हमारे पास कोई एकदम अलहदा सी खूबी होती है। यानी अगर आप किसी खास हुनर को हासिल करने के लिए मशक्कत करते हैं, तो आपको अभिमान कर के ये संकेत देना होता है कि आप ने इसके लिए उनसे ज़्यादा मेहनत की है। इसका उन्हें सम्मान करना चाहिए।
कनाडा की मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डेनियल स्नाइसर कहते हैं कि, "गुरूर के जरिए आप अपनी कामयाबी की नुमाइश करते हैं। वरना किसी को कैसे पता चलेगा कि आप की कामयाबी है क्या। मुझे आपकी अहमियत का एहसास इसी तरह से होता है।"2017 में इस पर एक बड़ी रिसर्च छपी थी। इसे लेडा कॉस्माइड्स और डेनियल स्नाइसर ने दूसरे मनोवैज्ञानिकों के साथ मिलकर किया था। इसमें अमरीका से लेकर जापान तक 16 देशों के लोगों पर तजुर्बे किए गए थे। लोगों से पूछा गया था कि वो दूसरों की कौन-सी ख़ूबियां पसंद करते हैं और किन गुणों को वो अपने अंदर देखना चाहेंगे।
रिसर्च में पता चला कि जो लोग गुरूर को अच्छा मानते थे, वो ये भी मानते थे कि इससे उन्हें दूसरों की तारीफ हासिल होगी।अक्सर हम जिस बात पर अभिमान करते हैं, वो इस उम्मीद में करते हैं कि वो दूसरों की नजर में अच्छा होगा। फिर वो कोई काम हो या हुनर हो।अभिमान को अगर पैमानों पर कसें, तो हर काम से पहले हमारा जहन ये अटकल लगाता है कि उसकी दूसरे कितनी तारीफ करेंगे।
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की लेडा कॉस्माइड्स कहती हैं "जब इंसान शिकार कर के बसर करता था, तो गर्व करने का मकसद ये संकेत देना होता था कि आप की बेहतरी सब के हित में है।"लेडा की रिसर्च में पता चला है कि हम तब गुरूर महसूस करते हैं, जब हम कोई मुश्किल काम निपटाते हैं या फिर हमारे पास कोई एकदम अलहदा सी खूबी होती है। यानी अगर आप किसी खास हुनर को हासिल करने के लिए मशक्कत करते हैं, तो आपको अभिमान कर के ये संकेत देना होता है कि आप ने इसके लिए उनसे ज़्यादा मेहनत की है। इसका उन्हें सम्मान करना चाहिए।
कनाडा की मॉन्ट्रियल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डेनियल स्नाइसर कहते हैं कि, "गुरूर के जरिए आप अपनी कामयाबी की नुमाइश करते हैं। वरना किसी को कैसे पता चलेगा कि आप की कामयाबी है क्या। मुझे आपकी अहमियत का एहसास इसी तरह से होता है।"2017 में इस पर एक बड़ी रिसर्च छपी थी। इसे लेडा कॉस्माइड्स और डेनियल स्नाइसर ने दूसरे मनोवैज्ञानिकों के साथ मिलकर किया था। इसमें अमरीका से लेकर जापान तक 16 देशों के लोगों पर तजुर्बे किए गए थे। लोगों से पूछा गया था कि वो दूसरों की कौन-सी ख़ूबियां पसंद करते हैं और किन गुणों को वो अपने अंदर देखना चाहेंगे।
रिसर्च में पता चला कि जो लोग गुरूर को अच्छा मानते थे, वो ये भी मानते थे कि इससे उन्हें दूसरों की तारीफ हासिल होगी।अक्सर हम जिस बात पर अभिमान करते हैं, वो इस उम्मीद में करते हैं कि वो दूसरों की नजर में अच्छा होगा। फिर वो कोई काम हो या हुनर हो।अभिमान को अगर पैमानों पर कसें, तो हर काम से पहले हमारा जहन ये अटकल लगाता है कि उसकी दूसरे कितनी तारीफ करेंगे।
गुरूर को समान में सम्मान
इस रिसर्च पर ये कह कर सवाल उठाए गए कि ये तो औद्योगिक और विकसित देशों का हिसाब-किताब है। जहां पर लोगों की मीडिया और संवाद के दूसरे संसाधनों तक ज़्यादा पहुंच होती है। इसके बाद रिसर्चरों ने दक्षिण अमरीका, अफ्रीका और एशिया के 567 लोगों से यही सवाल पूछा कि वो दूसरों के किस गुण को पसंद करते हैं और कौन-सी खूबियां वो अपने अंदर लाना चाहेंगे।लोगों के जो जवाब मिले उसके संकेत साफ थे। वो चाहते थे कि वो देखने में मजबूत हों, अच्छे किस्सागो हों, अपनी हिफाजत कर सकें। ऐसे गुणों की मांग भी खूब दिखी और इनकी तारीफ भी हुई।
डेनियल स्नाइसर मानते हैं कि संकेत साफ हैं। अभिमान की हमारे समाज में खास अहमियत है।अमरीका की इलिनॉय यूनिवर्सिटी के जोई चेंग कहते हैं कि हमें ये तो हमेशा पता था कि गुरूर से हमें कामयाबी के शिखर पर पहुंचने में मदद मिलती है। मगर ये मदद कितनी होती है, इसका पता नहीं था। बड़ा सवाल ये है कि अगर हमारी तरक्की में अभिमान का इतना अहम रोल है तो इसके प्रति सोच इतनी नकारात्मक क्यों है?
लेडा कॉस्माइड और डेनियल स्नाइसर इसका जवाब देते हैं। वो कहते हैं कि "अपनी कामयाबी पर अभिमान करना तो ठीक, लेकिन कुछ लोग अहंकारी हो जाते हैं। ये ठीक नहीं है। जब आप अपनी कामयाबी को ज़्यादा समझते हैं। मगर दूसरों की नजर में वो सफलता उतनी अहम नहीं होती। टकराव तभी शुरू होता है।""आप कहते हैं कि मैंने फलां कामयाबी हासिल की। मेरा एहतराम करो। सामने वाला कहता है कि ठीक है कि तुमने वो काम किया। अच्छी बात है। मगर इस बात के लिए तुम्हें सलाम ठोकने का मेरा जी नहीं करता।"
डेनियल स्नाइसर मानते हैं कि संकेत साफ हैं। अभिमान की हमारे समाज में खास अहमियत है।अमरीका की इलिनॉय यूनिवर्सिटी के जोई चेंग कहते हैं कि हमें ये तो हमेशा पता था कि गुरूर से हमें कामयाबी के शिखर पर पहुंचने में मदद मिलती है। मगर ये मदद कितनी होती है, इसका पता नहीं था। बड़ा सवाल ये है कि अगर हमारी तरक्की में अभिमान का इतना अहम रोल है तो इसके प्रति सोच इतनी नकारात्मक क्यों है?
लेडा कॉस्माइड और डेनियल स्नाइसर इसका जवाब देते हैं। वो कहते हैं कि "अपनी कामयाबी पर अभिमान करना तो ठीक, लेकिन कुछ लोग अहंकारी हो जाते हैं। ये ठीक नहीं है। जब आप अपनी कामयाबी को ज़्यादा समझते हैं। मगर दूसरों की नजर में वो सफलता उतनी अहम नहीं होती। टकराव तभी शुरू होता है।""आप कहते हैं कि मैंने फलां कामयाबी हासिल की। मेरा एहतराम करो। सामने वाला कहता है कि ठीक है कि तुमने वो काम किया। अच्छी बात है। मगर इस बात के लिए तुम्हें सलाम ठोकने का मेरा जी नहीं करता।"
जेसिका ट्रेसी कहती हैं कि हमें ख़ुद पर गर्व करने और अहंकार करने में फर्क करना आना चाहिए। अपनी कामयाबी पर आप ख़ुश तो हों, मगर, दूसरे अगर उस सफलता को उस नजरिए से नहीं देखते, तो आप उन पर दबाव न बनाएं। क्योंकि दिक़्कत यहीं से शुरू होती है।
आत्मविश्वास तो ठीक, पर अहंकार नहीं
आत्ममुग्ध लोग अक्सर इन बारीक फर्क की सीमा पार कर जाते हैं। जो लोग अभिमान और अहंकार के इस फासले को समझते हैं। वो बेहतर इंसान बन पाते हैं। उनके संबंध भी दूसरे लोगों से बेहतर होते हैं। जोई चेंग और जेसिका ट्रेसी ने इस बारे में खिलाड़ियों पर रिसर्च की तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। पता चला कि जो खिलाड़ी आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं, अपने हुनर पर अभिमान करते हैं, वो ज़्यादा कामयाब होते हैं। उनका सम्मान भी ज़्यादा होता है।यानी अभिमान करने में कोई हर्ज नहीं। शर्त सिर्फ एक है। अपनी सफलता और अपने हुनर को खुद से बढ़-चढ़कर न आंकें, न हांकें।
आत्मविश्वास तो ठीक, पर अहंकार नहीं
आत्ममुग्ध लोग अक्सर इन बारीक फर्क की सीमा पार कर जाते हैं। जो लोग अभिमान और अहंकार के इस फासले को समझते हैं। वो बेहतर इंसान बन पाते हैं। उनके संबंध भी दूसरे लोगों से बेहतर होते हैं। जोई चेंग और जेसिका ट्रेसी ने इस बारे में खिलाड़ियों पर रिसर्च की तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। पता चला कि जो खिलाड़ी आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं, अपने हुनर पर अभिमान करते हैं, वो ज़्यादा कामयाब होते हैं। उनका सम्मान भी ज़्यादा होता है।यानी अभिमान करने में कोई हर्ज नहीं। शर्त सिर्फ एक है। अपनी सफलता और अपने हुनर को खुद से बढ़-चढ़कर न आंकें, न हांकें।