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दफ्तर आना-जाना ऐसे बनाएं कम तनावपूर्ण
मार्क जोहानसन/ बीबीसी कैपिटल
Updated Tue, 26 Jul 2016 05:04 PM IST
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हम में से बहुत से लोग दफ्तर जाने के लिए लंबा सफर तय करते हैं। दफ्तर आने-जाने में कई लोग घंटों सफर में गुजारते हैं। अक्सर ये सफर थकाऊ और उबाऊ होता है। वक्त की बर्बादी लगता है। दुनिया में बहुत से लोग दफ्तर आने-जाने के दौरान ये तनाव झेलते हैं। इस बारे में इयान गेटली ने एक किताब लिखी है। इसका नाम है, 'रश ऑवर: हाऊ 500 मिलियन कम्यूटर्स सर्वाइव द डेली जर्नी टू वर्क।'
गेटली कहते हैं कि दफ्तर जाने के लिए लंबी दूरी तय करना तनाव भरा है और तनाव के बहुत सारे साइड इफेक्ट होते हैं। वो कहते हैं कि इस लंबे सफर के दौरान बहुत से लोग खुद को लाचार महसूस करते हैं। क्योंकि अक्सर आप ट्रेन में या मेट्रो में या सड़क पर जाम में फंस जाते हैं और आप इनसे बचने के लिए कुछ कर भी नहीं सकते।
दफ्तर के लिए लंबा सफर तय करने के बहुत सारे नुकसान हैं। अमरीका की जेसिका पैच को ही लीजिए। उन्हें सैन फ्रैंसिस्को शहर में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिली। इस नौकरी में नई चुनौती थी। ज्यादा पैसे मिलने थे। जेसिका, अपनी प्रेगनेंसी के लिए इलाज करा रही थीं, सो उन्हें लगा कि चलो इलाज के लिए कुछ ज्यादा पैसे मिल जाएंगे। दिक्कत बस एक थी। उनके घर से दफ्तर की दूरी करीब 55 मील या 88 किलोमीटर थी।
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गेटली कहते हैं कि दफ्तर जाने के लिए लंबी दूरी तय करना तनाव भरा है और तनाव के बहुत सारे साइड इफेक्ट होते हैं। वो कहते हैं कि इस लंबे सफर के दौरान बहुत से लोग खुद को लाचार महसूस करते हैं। क्योंकि अक्सर आप ट्रेन में या मेट्रो में या सड़क पर जाम में फंस जाते हैं और आप इनसे बचने के लिए कुछ कर भी नहीं सकते।
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दफ्तर के लिए लंबा सफर तय करने के बहुत सारे नुकसान हैं। अमरीका की जेसिका पैच को ही लीजिए। उन्हें सैन फ्रैंसिस्को शहर में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिली। इस नौकरी में नई चुनौती थी। ज्यादा पैसे मिलने थे। जेसिका, अपनी प्रेगनेंसी के लिए इलाज करा रही थीं, सो उन्हें लगा कि चलो इलाज के लिए कुछ ज्यादा पैसे मिल जाएंगे। दिक्कत बस एक थी। उनके घर से दफ्तर की दूरी करीब 55 मील या 88 किलोमीटर थी।
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काम के लिए लंबा सफर तय करना सेहत पर डालता है बुरा असर
रोज दफ्तर आने-जाने में जेसिका को चार घंटे लगते थे। इस दौरान कभी वो गाने सुनकर, तो कभी रेडियो पर ओप्रा विन्फ्रे का थेरेपी शो सुनकर वक्त गुजारती थीं। मगर सफर का तनाव दिनों-दिन बढ़ता गया। खासतौर से ऑफिस में थकान भरा दिन गुजारने के बाद घर वापसी का सफर बेहद तकलीफदेह होता था। कुछ ही महीनों में जेसिका को कई और बीमारियां हो गईं। तनाव की वजह से पेट गड़बड़ रहने लगा।
घंटों कार में बैठे रहने से कमर में दर्द की भयानक परेशानी हो गई और प्रेगनेंसी की बात तो भूल ही जाओ। नौ महीने तक ये तनाव और तकलीफ झेलने के बाद आखिर जेसिका ने नौकरी छोड़ दी। वो घर से काम करती हैं। पैसे भले ही कम मिलते हैं, मगर सुकून है। अगले कुछ महीनों में जेसिका अपने पहले बच्चे को जन्म देंगी। तो क्या काम करने के लिए लंबा सफर करना हमारी सेहत पर इतना बुरा असर डालता है? इस बारे में तमाम देशों में रिसर्च हुआ है।
कमोबेश सभी का यही नतीजा रहा है कि दफ्तर जाने के लिए लंबी दूरी तय करने से लोगों को थकान, नींद न आने की परेशानी होती है। वो सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं। उन्हें जज्बाती दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। इस तनाव का असर उनकी निजी जिंदगी, उनके परिवार और बच्चों पर भी पड़ता है। अमरीका में हुए एक सर्वे के मुताबिक अगर कोई हफ्ते में पंद्रह घंटे दफ्तर आने जाने में खर्च करता है, तो वो रोजाना आधे घंटे की नींद का नुकसान उठाता है।
घंटों कार में बैठे रहने से कमर में दर्द की भयानक परेशानी हो गई और प्रेगनेंसी की बात तो भूल ही जाओ। नौ महीने तक ये तनाव और तकलीफ झेलने के बाद आखिर जेसिका ने नौकरी छोड़ दी। वो घर से काम करती हैं। पैसे भले ही कम मिलते हैं, मगर सुकून है। अगले कुछ महीनों में जेसिका अपने पहले बच्चे को जन्म देंगी। तो क्या काम करने के लिए लंबा सफर करना हमारी सेहत पर इतना बुरा असर डालता है? इस बारे में तमाम देशों में रिसर्च हुआ है।
कमोबेश सभी का यही नतीजा रहा है कि दफ्तर जाने के लिए लंबी दूरी तय करने से लोगों को थकान, नींद न आने की परेशानी होती है। वो सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं। उन्हें जज्बाती दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। इस तनाव का असर उनकी निजी जिंदगी, उनके परिवार और बच्चों पर भी पड़ता है। अमरीका में हुए एक सर्वे के मुताबिक अगर कोई हफ्ते में पंद्रह घंटे दफ्तर आने जाने में खर्च करता है, तो वो रोजाना आधे घंटे की नींद का नुकसान उठाता है।
सफर के दौरान प्लानिंग कीजिए
हालांकि कुछ ताजा रिसर्च ये भी कह रहे हैं कि इस लंबे सफर का नुकसान कम भी किया जा सकता है, अगर हम कुछ बातों पर अमल करें। घर और दफ्तर के बीच की दूरी, हमें मौका देती है कि घर और दफ्तर की चुनौतियों को अलग करके देखें। जानकार कहते हैं कि दफ्तर आने-जाने के वक्त को बिताने के कई ऐसे तरीके हैं जो सफर का तनाव कम कर सकते हैं।
सफर के दौरान प्लानिंग कीजिए। लंदन में अभी एक बड़ी मीडिया कंपनी के 225 कर्मचारियों के बीच सर्वे हुआ। पता चला कि वो घर से दफ्तर के लिए जितनी ज्यादा दूरी तय करते थे, उतने ही वो नाखुश और अपने काम से असंतुष्ट थे। मगर कुछ लोग ऐसे भी थे, जिनका खुद पर काबू था। ये लोग उतना तनाव नहीं झेलते थे। इयान गेटली के साथ रश ऑवर किताब लिखने वाले जॉन जाकिमोविच कहते हैं कि अगर खुद पर काबू हो तो नेगेटिव बातों के बजाय, लोग आगे की सोचते हैं।
इससे सफर का तनाव कम हो जाता है। सफर के दौरान आप दफ्तर के काम की फॉरवर्ड प्लानिंग कर सकते हैं। ये सोच सकते हैं कि दिन में आपको क्या करना है। कौन से टारगेट पूरे करने हैं। यही खयाल आप अपने निजी काम के बारे में भी अपने दिमाग में ला सकते हैं। पूरे हफ्ते की प्लानिंग करके, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने की बातें सोच सकते हैं। अपने करियर को लेकर आगे की प्लानिंग भी आप कर सकते हैं।
रोजाना कुछ मिनटों तक ये दिमागी वर्जिश करके, आप सफर के तनाव से बच सकते हैं। इससे दफ्तर जाते वक्त आप घरेलू जिम्मेदारी का खयाल दिल से निकालकर, पेशेवर चुनौतियों के लिए तैयार होंगे।
घर वापसी के वक्त दफ्तर का तनाव छोड़कर, निजी जिंदगी के मसलों पर ध्यान लगा सकेंगे।
सफर के दौरान प्लानिंग कीजिए। लंदन में अभी एक बड़ी मीडिया कंपनी के 225 कर्मचारियों के बीच सर्वे हुआ। पता चला कि वो घर से दफ्तर के लिए जितनी ज्यादा दूरी तय करते थे, उतने ही वो नाखुश और अपने काम से असंतुष्ट थे। मगर कुछ लोग ऐसे भी थे, जिनका खुद पर काबू था। ये लोग उतना तनाव नहीं झेलते थे। इयान गेटली के साथ रश ऑवर किताब लिखने वाले जॉन जाकिमोविच कहते हैं कि अगर खुद पर काबू हो तो नेगेटिव बातों के बजाय, लोग आगे की सोचते हैं।
इससे सफर का तनाव कम हो जाता है। सफर के दौरान आप दफ्तर के काम की फॉरवर्ड प्लानिंग कर सकते हैं। ये सोच सकते हैं कि दिन में आपको क्या करना है। कौन से टारगेट पूरे करने हैं। यही खयाल आप अपने निजी काम के बारे में भी अपने दिमाग में ला सकते हैं। पूरे हफ्ते की प्लानिंग करके, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने की बातें सोच सकते हैं। अपने करियर को लेकर आगे की प्लानिंग भी आप कर सकते हैं।
रोजाना कुछ मिनटों तक ये दिमागी वर्जिश करके, आप सफर के तनाव से बच सकते हैं। इससे दफ्तर जाते वक्त आप घरेलू जिम्मेदारी का खयाल दिल से निकालकर, पेशेवर चुनौतियों के लिए तैयार होंगे।
घर वापसी के वक्त दफ्तर का तनाव छोड़कर, निजी जिंदगी के मसलों पर ध्यान लगा सकेंगे।
सफर के दौरान दूसरों से बातें न करना सबसे खराब आदत
जो लोग अपनी गाड़ी से दफ्तर नहीं जाते, वो सफर के दौरान किताबें पढ़कर वक्त गुजारते हैं। कई लोग ई-मेल चेक करके उसका जवाब देने में वक्त काट लेते हैं। वहीं कुछ लोग सोशल मीडिया पर वक्त गुजारते हैं। कुछ लोग सफर के दौरान दूसरों से न बातें करते हैं, न घुलते-मिलते हैं। ये लंबे सफर की सबसे खराब बात है। जो लोग अपनी गाड़ी से दफ्तर जाते हैं, उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करने वालों के मुकाबले कम वक्त लगता है। वहीं पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आने-जाने वालों को सफर में ज्यादा वक्त गुजारने के साथ अनजान लोगों की भीड़ के साथ वक्त बिताना पड़ता है।
आमतौर पर इंसान जब अनजान लोगों के बीच रहता है तो वो एक हाथ की दूरी बनाए रखता है। लेकिन मेट्रो में, बस में या ट्रेन में सफर के दौरान ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं होता। इयान गेटली कहते हैं कि अक्सर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लोग अमानवीय हालात में सफर करते हैं। टोक्यो, बीजिंग, दिल्ली-मुंबई या मॉस्को जैसे शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इतनी भीड़ होती है कि आप अनजान लोगों से टकराते चलते हैं।
इससे आपकी निजता में दखल होता है।
ऐसे हालात में ज्यादातर लोग साथी मुसाफिर को एक फर्नीचर से ज्यादा कुछ नहीं समझते। जिससे बिना बातें किए भी काम चल जाना है। इतने करीब होने पर भी लोग एक दूसरे से हाय-हैलो भी नहीं करते। लेकिन, अगर आप साथी मुसाफिर से बातें करना शुरू करेंगे तो आपको सफर का तनाव कम करने का अच्छा जरिया मिल जाएगा।
आमतौर पर इंसान जब अनजान लोगों के बीच रहता है तो वो एक हाथ की दूरी बनाए रखता है। लेकिन मेट्रो में, बस में या ट्रेन में सफर के दौरान ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं होता। इयान गेटली कहते हैं कि अक्सर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लोग अमानवीय हालात में सफर करते हैं। टोक्यो, बीजिंग, दिल्ली-मुंबई या मॉस्को जैसे शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इतनी भीड़ होती है कि आप अनजान लोगों से टकराते चलते हैं।
इससे आपकी निजता में दखल होता है।
ऐसे हालात में ज्यादातर लोग साथी मुसाफिर को एक फर्नीचर से ज्यादा कुछ नहीं समझते। जिससे बिना बातें किए भी काम चल जाना है। इतने करीब होने पर भी लोग एक दूसरे से हाय-हैलो भी नहीं करते। लेकिन, अगर आप साथी मुसाफिर से बातें करना शुरू करेंगे तो आपको सफर का तनाव कम करने का अच्छा जरिया मिल जाएगा।
अनजान लोगों से बातें करेंगे तो आपका तनाव छू मंतर हो जाएगा
शिकागो यूनिवर्सिटी के निकोलस एप्ले कहते हैं कि सफर के दौरान किसी से बात न करना, तनाव की सबसे बड़ी वजह है। जो हम अक्सर मेट्रो में, लोकल ट्रेन में या फिर बसों में झेलते हैं जब आप भीड़ के बीच अकेले महसूस करते हैं। हर इंसान दूसरे के बारे में यही सोचता है कि वो बात नहीं करना चाहता और इस तरह कोई भी एक-दूसरे से बात करने की कोशिश नहीं करता।
निकोलस एप्ले कहते हैं कि अगर आप लंबे सफर के दौरान अनजान लोगों से बातें करेंगे तो आपका तनाव छू मंतर हो जाएगा। एप्ले के मुताबिक, इंसान सामाजिक प्राणी है। वो लोगों से जुड़ना चाहता है।
लेकिन हम ये नहीं जानते कि अनजान लोग हमसे बात करने को कितने बेताब रहते हैं। अभी शिकागो में हुए सर्वे में पता चला कि सफर के दौरान लोगों को लगता है कि केवल 40 फ़ीसद अनजान मुसाफिर उनसे बात करेंगे।
मगर सच तो ये है कि ये आंकड़ा सौ फीसद है। यानी हर कोई अनजान साथी मुसाफिर से बात करने को राजी था। निकोलस एप्ले सलाह देते हैं कि वक्त पूछकर, किसी की तारीफ करके, या कोई किताब पढ़ रहा हो तो उस बारे में सवाल करके, बातचीत शुरू की जा सकती है। फिर आपका भी सफर आसान होगा और उसका भी जिससे आपने बातें कीं। यकीन जानिए आप बेहतर महसूस करेंगे। तो, अनजान मुसाफिरों से बात करके देखिए। क्योंकि, बात करने से ही तो बात बनती है।
निकोलस एप्ले कहते हैं कि अगर आप लंबे सफर के दौरान अनजान लोगों से बातें करेंगे तो आपका तनाव छू मंतर हो जाएगा। एप्ले के मुताबिक, इंसान सामाजिक प्राणी है। वो लोगों से जुड़ना चाहता है।
लेकिन हम ये नहीं जानते कि अनजान लोग हमसे बात करने को कितने बेताब रहते हैं। अभी शिकागो में हुए सर्वे में पता चला कि सफर के दौरान लोगों को लगता है कि केवल 40 फ़ीसद अनजान मुसाफिर उनसे बात करेंगे।
मगर सच तो ये है कि ये आंकड़ा सौ फीसद है। यानी हर कोई अनजान साथी मुसाफिर से बात करने को राजी था। निकोलस एप्ले सलाह देते हैं कि वक्त पूछकर, किसी की तारीफ करके, या कोई किताब पढ़ रहा हो तो उस बारे में सवाल करके, बातचीत शुरू की जा सकती है। फिर आपका भी सफर आसान होगा और उसका भी जिससे आपने बातें कीं। यकीन जानिए आप बेहतर महसूस करेंगे। तो, अनजान मुसाफिरों से बात करके देखिए। क्योंकि, बात करने से ही तो बात बनती है।