फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Lifestyle ›   Stress Management ›   How good is it to hear your own voice

कितना सही होता है अपने मन की आवाज को सुनना, रिसर्च बड़ी दिलचस्प है

Fri, 15 Jun 2018 08:48 AM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 15 Jun 2018 08:48 AM IST
विज्ञापन
How good is it to hear your own voice
stress management
अगर आप कोई बात किसी ठोस वजह और आधार के बिना कहेंगे तो कोई आपकी बात नहीं मानेगा। आज तर्कसंगत सोच का जमाना है। तर्क हमें वजह तलाशने पर मजबूर करते हैं। हम सभी मानते हैं कि कुछ भी बेवजह नहीं होता। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम बिना किसी वजह के मान लेते हैं। ऐसी बातों का आधार होते हैं हमारे जज्बात। 
विज्ञापन


आज की तर्कसंगत सोच वाली पीढ़ी अतार्किक लोगों को पिछड़ी सोच का मानती है। माना जाता है कि साइंस की तरक्की से पहले ऐसी बातें होती थीं। आज ये सब अविश्वसनीय हैं, लेकिन साइंस ही इस बात पर मुहर लगाता है कि जज्बात बेवजह नहीं होते। उन्हें आसानी से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता और ना ही उन्हें तर्क की कसौटी पर परखा जा सकता है। इसके बावजूद उनकी अपनी अहमियत है। आभास बेवजह नहीं होते। ये हमारी सोच और तजुर्बों का नतीजा होते हैं। दरअसल तमाम तरह की जानकारियों को हमारा दिमाग काटता-छांटता रहता है और याददाश्त के अलग अलग खानों में उन्हें जमा करता रहता है।
विज्ञापन

क्या आभास बेवजह होते हैं?

रिसर्च दावा करती हैं कि हमारा मस्तिष्क कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर की तरह काम करता है। वो मौजूदा हालात और तजुर्बे की पुरानी जानकारियों और तजुर्बों से तुलना करता है और तुरंत कमांड देता है कि अब आगे क्या होने वाला है। वैज्ञानिक दिमाग के काम करने के इस तरीके को 'प्रिडिक्टिव प्रोसिसिंग फ़्रेमवर्क' कहते हैं।

हमारा दिमाग मौजूदा हालात से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहता है। अगर ऐसी कोई घटना घटती है, जो दिमाग में मौजूद डेटा से मेल नहीं खाती तो दिमाग तुरंत ही अपने अंदर बंद आंकड़ों को अपडेट करता है। ये सब जान-बूझकर नहीं किया जाता, बल्कि दिमाग बिना किसी आदेश के ये काम खुद करता रहता है।

क्या है आभास और कैसे होता है?

ऐसा भी नहीं है कि हमें हर समय ही आभास होते हैं। ये तभी होता है जब दिमाग में मौजूदा हालात से मिलती जुलती कोई जानकारी जमा होती है और दिमाग उस पुराने डेटा से उसका मिलान कर लेता है। मिसाल के लिए आप अंधेरे में सड़क के बीचो-बीच गाड़ी चला रहे हैं। अचानक आपको एहसास होता है कि साइड होकर गाड़ी चलानी चाहिए। कुछ ही दूर जाकर आप देखते हैं कि सड़क के बीचों बीच बड़ा गड्ढा है। अगर आपको किनारे गाड़ी चलाने का एहसास नहीं हुआ होता, तो कोई बड़ा हादसा हो सकता था। यानी आपके दिमाग को आभास हो गया था कि आगे कुछ गड़बड़ जरूर है।

दरअसल हम जिस तरह के माहौल में रहते हैं और जिन रास्तों से गुजरते हैं, हमारा दिमाग़ उनसे वाकिफ हो जाता है। दिमाग वहां की सारी जानकारियां अपने पास जमा कर लेता है। वो मौजूदा हालात की अपने पास जमा जानकारियों से तुलना करता रहता है। इसीलिए तजुर्बे की बुनियाद पर आभास को ज्दाया भरोसेमंद बनाया जा सकता है।
विज्ञापन

क्या आभास के आधार पर लेने चाहिए फैसले?

मनोवैज्ञानिक साहित्य में आभास को दो तरह की सोच में बांटा गया है। इनके मुताबिक आभास वाली सोच तीव्र, अवचेतन मन में उपजने वाली स्वचालित सोच है। जबकि किसी बात या तजुर्बे का हिसाब-किताब लगाने वाली सोच तर्क के आधार पर जान-बूझकर तैयार की जाती है। इसे तैयार होने में टाइम भी लगता है।

रिसर्च बताती हैं कि दिमाग एक ही वक्त में दोनों तरह की सोच तैयार करने का काम नहीं करता। ये तरीका आगे पीछे होता रहता है। इन दोनों का आपस में कोई ताल्लुक भी नहीं है। हां, इतना जरूर है कि ये दोनों ही सोच एक दूसरे पर हावी होने की कोशिश जरूर करती हैं। हम सभी जाने-अनजाने दोनों ही सोच का इस्तेमाल करते हैं।

दावा तो ये भी किया जाता है कि बड़ी-बड़ी साइंस रिसर्च भी आभास की बुनियाद पर की गई हैं। वैज्ञानिकों के आभास ने ही उन्हें नए आइडिया पर काम करके नया कॉन्सेप्ट तैयार करने की प्रेरणा दी। बाद में उन्हीं की परिकल्पना के आधार पर प्रयोग करके किसी ठोस नतीजे पर पहुंचा गया।

कई बार गुमराह भी करते हैं आभास

कहने को तो आभास वाली सोच के नतीजे डांवाडोल होते हैं लेकिन, कई बार विश्लेषणात्मक सोच के नतीजे भी ऐसे ही साबित होते हैं। रिसर्च बताती हैं कि बहुत ज्यादा सोच-विचार, फैसला लेने की सलाहियत पर असर डालता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि विश्लेषणात्मक सोच के आधार पर लिए गए फैसलों को सही साबित करने के लिए हम आभासी सोच को ही जिम्मेदार ठहराते हैं।

कई मर्तबा हम फैसला ले लेते हैं लेकिन वजह हमारे पास नहीं होती। अगर आभास वाली सोच हमारे फैसलों को इतना प्रभावित करती है, तो सवाल उठता है कि क्या विश्लेषणात्मक सोच की तरह इस पर भी भरोसा किया जाए।

आभास चूंकि पुराने तजुर्बे की बुनियाद पर होते हैं। तीव्र होते हैं और अपना फैसला खुद ही करते हैं। ऐसे में कई तरह की खामियां भी हो जाती हैं। आभास हमें कई मर्तबा गुमराह भी कर देते हैं और कई बार दिमाग खुद भी सोच तैयार करते समय भेद-भाव कर जाता है। लिहाजा सलाह यही है कि आभास को अपने मौजूदा हालात से जोड़कर देखिए। अगर आभास मौजूदा हालात और तजुर्बे से मेल नहीं खाता तो फिर विश्लेषणात्मक सोच पर विचार कीजिए। लेकिन आभास को पूरी तरह नज़र अंदाज मत कीजिए। मुश्किल फैसले की घड़ी में दोनों सोच की तुलना करके फैसला कीजिए।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News App अपने मोबाइल पे|
Get all update about bollywood news, fitness news, cricket news, Entertainment news in Hindi. Stay updated with us for all breaking hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed