जिसके लिए मेरा शहर, साल भर तरसा
वो पानी, अमृत बनकर नवरात्र में बर्षा
गर्मी, उमस ने सूबे को, कर रखा था बेचैन
ठण्डी पड़ी फुहार तो सभी का मन हर्षा
जिसके लिए मन मेरा, सालभर तरसा
वो पानी, अमृत बनके नवरात्र में बरसा
मानसून की आस में बीत गया लम्बा अरसा
बिजली चमकी, बादल गरजे, पर पानी न बरसा
आए जो नवरात्र तो, टूट के ऐसे बरसे बदरा
जैसे उड़ते बादलों में, हवाओं ने लगाया फरसा
जिसके लिए गांव मेरा, साल भर तरसा
वो पानी अमृत बनकर नवरात्र में बरसा
बारिश की बूंदों ने भर दिया खाली कलशा
उत्साही भक्तों ने मनाया, होली का भी जलसा
तृप्त हुई धरती, सूखे पेड़ांे को मिला नवजीवन
मुस्काती बौछारों ने, खेतों को भोजन परसा
जिसके लिए हर प्राणी, साल भर तरसा
वो पानी, अमृत बनकर, नवरात्र में बरसा
-आशीष श्रीवास्तव
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X