आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सपूत भारती

Sapoot Bharati
                
                                                         
                            विभिन्नता के देश में,
                                                                 
                            
अखण्डता की आरती
है गा रहा गरजता
हुआ सपूत भारती
कांपने लगे हैं सीने दुश्मनों के सुन के ये
प्रचंडता लिए हुए जो आ रहा महारथी
साहसी अदम्य, शील क्षम्य,
से भरा, चेतन्य
भय नहीं तनिक कि
राह में घना अरण्य है
धन्य है धरा कि पुण्य आत्मा
की मां अनन्य
शूरवीर सा प्रवीण, दंभ में नगण्य है
जिद्द जो, प्रसिद्ध है
ये सिद्ध कि प्रबुद्ध है
चित्त से विशुद्ध और
युद्ध के विरुद्ध है
वक्त सा जो सख्त है
सशक्त है समृद्ध है
राष्ट्र का जो भक्त और
कर्म युक्त शख्स है
उसे ही आज गर्व से
वसुन्धरा पुकारती
विभिन्नता के देश में,
अखण्डता की आरती
है गा रहा गरजता
हुआ सपूत भारती

डॉ. सतेंद्र कुमार

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर