आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ओस की तपिश

Oss Ke Tapish
                
                                                         
                            दिसम्बर के महीने की
                                                                 
                            
कड़क ठंड, जबरदस्त कोहरा
और तुषार इंसान, पशु, पक्षी
हर एक बेहाल सर्दी से

आज की सुबह-सुबह
जब हम-तुम, ओस पड़ी
हरी घास पर जब नंगे पैर
साथ साथ टहल रहे थे, तब,.....

कई बार तुम्हारे पैर के पंजे,
मेरे पैर के पंजे से छुए,
हर बार यही लगा कि,
"ओस" की भी "तपिश" होती हैं...!!

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर