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काले मेघ की अाराधना

                
                                                         
                            प्यासी धरती अब आसमान ताकती है।
                                                                 
                            
बच्चों की भूख उसके दरमियान ताकती है।
इस साल बरस, की मकान गिरवी है,
कई बरस से द्वार पर ,भूखी डायन ताकती है।
नजर वँहा ठहरती है,जँहा पीठ पर बस्ते हैं,
उनके बच्चों की नजर, वो द्वार ताकती है।
पानी न पहुंचा खेतों तक,नहरों के मुंह भी बंद पड़े है,
हर सरकार उसमें भी व्यापार ताकती है।
तू न बरसा तो ये, फन्दों पर लटक जायेंगे,
उनकी नाउम्मीद गले का हार ताकती है।
टूटा आशियाना उनका, बिजली से झुलस जाएगा।
सूखती फ़सल तेरी बिजली की, मार ताकती है।
अनाथ होने से बचेंगे,कई घोंसलो के परिंदे,
मरते किसानों की , ये पुकार ताकती है।

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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