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अमृता प्रीतम: स्त्रीवाद को शब्द दर शब्द जिया

अमृता प्रीतम: स्त्रीवाद को शब्द दर शब्द जिया
                
                                                         
                            एक चित्रकार और एक कवयित्री गर मिल जाएं तो क्या हो? मुझे लगता है तब ऐसा सजृन होगा जो कालजयी बन जाएगा। मैं एक ऐसी ही प्रेम कहानी बता रही हूं जो सिर्फ़ प्रेम कहानी नहीं बल्कि प्रेम का एक अनोखा संसार हैं जहां वो चित्रकार है इमरोज़ और कवयित्री हैं अमृता प्रीतम।
                                                                 
                            

अमृता मुझे स्त्री आज़ादी का एक संपूर्ण व्यक्तित्व एक संपूर्ण प्रतीक नज़र आती हैं। उन्होंने स्त्री आज़ादी को जिया है एक ऐसे दौर में जब वो सब करना आसान नहीं था बल्कि उसके लिए लड़ जाना होता था ज़िद पर अड़ जाना होता था। तभी तो वो आज तक लड़कियों के लिए एक रोल मॉडल हैं। 

अमृता के लिए आज़ादी का मतलब पहले था भावनात्मक आज़ादी और फिर सामाजिक आज़ादी। अपने जीवन में अपने लिए उन्होंने ये दोनों आज़ादी हासिल की। मेरे लिए अमृता प्रीतम आज की उन तमाम दोगली स्त्रीवादी नेताओं कार्यकर्ताओं से ज़्यादा बड़ी हो जाती हैं क्योंकि अमृता सिर्फ़ स्त्री आज़ादी के लिए लिखती नहीं, बोलती नहीं, बल्कि अपने जीवन में अमल भी करती हैं। 

अमृता का जन्म 31 अगस्त, 1919 को हुआ था। लिखना उनका करियर नहीं जुनून था। उनका लेखन भावनाओं, संवेदनाओं और प्रेम से ओतप्रोत रहा। वो जैसी थीं वैसा ही था उनका लेखन। 

उस दौर में जब कोई लिव इन रिलेशनशिप के बारे में सोच नहीं सकता था, सिगरेट पीने के बारे में सोच नहीं सकता था, अमृता ने किया, सब कुछ किया, सबसे हटके किया, वो अलग थीं वाकई अलग। 

ये तो एक शुरुआत भर थी लेकिन इससे बरसों पहले अमृता के ज़हन में एक काल्पनिक प्रेमी मौजूद था और उसे उन्होंने राजन नाम भी दिया था। अमृता ने इसी नाम को अपनी ज़िंदगी की पहली नज़्म का विषय बनाया। बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी उन्होंने अपनी पहली नज़्म लिखी। पिता के हाथ लग गई नज़्म फिर क्या था? पूछा गया राजन कौन है? अमृता ने झूठ बोला, कहा - कोई नहीं। पिता को ऐतबार नहीं हुआ। पिता ने उन्हें ज़ोर से चपत लगाई और वो काग़ज़ फाड़ दिया। 

अमृता कहती हैं, "ये हश्र था मेरी पहली नज़्म का। झूठ बोलकर अपनी नज़्म किसी और के नाम लगानी चाही थी लेकिन वो नज़्म एक चपत को साथ लिए फिर से मेरे नाम लग गई।"

दुनिया में हर आशिक़ की तमन्ना होती है कि वो अपने इश्क़ का इज़हार करे। लेकिन अमृता और इमरोज़ इस मामले में अनूठे थे कि उन्होंने कभी भी एक दूसरे से नहीं कहा कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं। आगे पढ़ें

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8 वर्ष पहले

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