शेरों-शायरी की दुनिया में मिर्जा गालिब एक पैमाना है जिसके आगे लगभग सारे शायर नतमस्तक हैं। गालिब ने शायरी की दुनिया को मोहब्बत और गम से ऐसा लबरेज किया है कि उलफत का गुलशन आज भी गालिब की शायरियों से महक रहा है। गालिब की परिपाटी में चलकर ही कई शायरों ने अपने को मुकम्मल किया है। 220 साल बाद भी गालिब के चाहने वालों की कमी नहीं है। इतने सालों बाद उतनी ही शिद्दत से गालिब को आज भी तारीफ मिल रही है। गालिब पर हम यहां काव्य चर्चा के तहत उनके 10 स्पेशल शेर पेश कर रहे हैं।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का...
1-मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
2-उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता...
3-न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
4-आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना...
5-बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
6-हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन...
7-हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल को ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
8-हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
-क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ...
9-क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
10-रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
- मिर्ज़ा ग़ालिब
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