साहिर लुधियानवी एक मुकम्मल शायर थे, उनकी जो मक्बूलियत मोहब्बत के जहान में है उसका कोई सानी नहीं है। साहिर के नग़मों से इश्क की मिट्टी की वो सौंधी ख़ुशबू आती है, जिससे न जाने कितने दिलों के बगीचे ग़ुलज़ार होते हैं। साहिर की जितनी शिदद्त प्यार को निभाने में थी, उतनी ही उसके दिए दर्द में भी थी। वह रूमानियत की वो परिपाटी हैं जिससे मोहब्बत की मसर्रत के फूल झड़ते हैं। उनकी नज़्में बयान हैं सुख़न-ए-मोहब्बत का, आप भी मुलाहिज़ा फरमाइए।
मैं मुन्तज़िर हूं मगर तेरा इन्तज़ार नहीं...
हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं
मैं मुन्तज़िर हूं मगर तेरा इन्तज़ार नहीं
हमीं से रंग-ए-गुलिस्तां हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज्म-ए-गुलिस्तां पे इख्तियार नहीं
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ए मुतरिब
अभी हयात का माहौल ख़ुशगवार नहीं
तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं
न जाने कितने गिले इस में मुज्तिरब हैं नदीम
वो एक दिल जो किसी का गिलागुसार नहीं
गुरेज़ का नहीं क़ायल हयात से लेकिन
जो सोज़ कहूं तो मुझे मौत नागवार नहीं
ये किस मक़ाम पे पहुंचा दिया ज़माने ने
कि अब हयात पे तेरा भी इख्तियार नहीं
मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने...
मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने
अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने
उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैंने
बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदों
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा...
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही
इस रात की निखरी रंगत को
कुछ और निखर जाने दे ज़रा
नज़रों को बहक जाने दे ज़रा
ज़ुल्फ़ों को बिखर जाने दे ज़रा
कुछ देर की ही तस्कीन सही
कुछ देर का ही आराम सही
जज़्बात की कलियाँ चुनना है
और प्यार का तोहफ़ा देना है
लोगों की निगाहें कुछ भी कहें
लोगों से हमें क्या लेना है
ये ख़ास त'अल्लुक़ आपस का
दुनिया की नज़र में आम सही
रुसवाई के डर से घबरा कर
हम तर्क-ए-वफ़ा कब करते हैं
जिस दिल को बसा लें पहलू में
उस दिल को जुदा कब करते हैं
जो हश्र हुआ है लाखों का
अपना भी वही अंजाम सही
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही
तू पास नहीं और पास भी है...
मायूस तो हूं वायदे से तेरे, कुछ आस नहीं कुछ आस भी है
मैं अपने ख्यालों के सदके, तू पास नहीं और पास भी है।
दिल ने तो खुशी माँगी थी मगर, जो तूने दिया अच्छा ही दिया
जिस गम को तअल्लुक हो तुझसे, वह रास नहीं और रास भी है।
पलकों पे लरजते अश्कों में तसवीर झलकती है तेरी
दीदार की प्यासी आँखों को, अब प्यास नहीं और प्यास भी है।
आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं...
तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन
तिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं
ये जान कर तुझे जाने कितना ग़म पहुचें
कि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं
किसी की हो के तू इस तरह मेरे घर आई
कि जैसे फिर कभी आए तो घर मिले न मिले
नज़र उठाई, मगर ऐसी बे-यकीनी से
कि जिस तरह कोई पेशे-नज़र मिले न मिले
तू मुस्कुराई, मगर मुस्कुरा के रुक सी गई
कि मुस्कुराने से ग़म की खबर मिले न मिले
रुकी तो ऐसे, कि जैसे तिरी रियाज़त को
अब इस समर से ज़ियादा समर मिले न मिले
गई तो सोग में डूबे क़दम ये कह के गए
सफ़र है शर्त, शरीके-सफ़र मिले न मिले
तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन
तिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं
ये जान कर तुझे क्या जाने कितना ग़म पहुंचे
कि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं
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मैं मुन्तज़िर हूं मगर तेरा इन्तज़ार नहीं...
8 वर्ष पहले
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