साहिर लुधियानवी एक मुकम्मल शायर थे, उनकी जो मक्बूलियत मोहब्बत के जहान में है उसका कोई सानी नहीं है। साहिर के नग़मों से इश्क की मिट्टी की वो सौंधी ख़ुशबू आती है, जिससे न जाने कितने दिलों के बगीचे ग़ुलज़ार होते हैं। साहिर की जितनी शिदद्त प्यार को निभाने में थी, उतनी ही उसके दिए दर्द में भी थी। वह रूमानियत की वो परिपाटी हैं जिससे मोहब्बत की मसर्रत के फूल झड़ते हैं। उनकी नज़्में बयान हैं सुख़न-ए-मोहब्बत का, आप भी मुलाहिज़ा फरमाइए।
हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं
मैं मुन्तज़िर हूं मगर तेरा इन्तज़ार नहीं
हमीं से रंग-ए-गुलिस्तां हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज्म-ए-गुलिस्तां पे इख्तियार नहीं
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ए मुतरिब
अभी हयात का माहौल ख़ुशगवार नहीं
तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं
न जाने कितने गिले इस में मुज्तिरब हैं नदीम
वो एक दिल जो किसी का गिलागुसार नहीं
गुरेज़ का नहीं क़ायल हयात से लेकिन
जो सोज़ कहूं तो मुझे मौत नागवार नहीं
ये किस मक़ाम पे पहुंचा दिया ज़माने ने
कि अब हयात पे तेरा भी इख्तियार नहीं
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मैं मुन्तज़िर हूं मगर तेरा इन्तज़ार नहीं...
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