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1962 में चीनी आक्रमण के बाद उभरी परिस्थितियों पर धर्मवीर भारती की कविता- पुराना किला 

1962 में चीनी आक्रमण के बाद उभरी परिस्थितियों पर धर्मवीर भारती की कविता- पुराना किला
                
                                                         
                            भारत के स्वातन्त्र्योत्तर इतिहास का सबसे पहला और सबसे बड़ा हादसा था- 20 अक्तूबर 1962 में चीन का आक्रमण। उसने न केवल सारे देश को हतप्रभ कर दिया था, हमारी दु:खद पराजय ने अब तक पाले हुए सारे सपनों के मोहजाल को छिन्न-भिन्न कर दिया था और मानो एक ही चोट में नेहरू युग की सारी विसंगतियाँ उजागर हो गयी थीं। 
                                                                 
                            

विचित्र यह था कि इस भयानक शून्य को किन्हीं नये मूल्यों से या आदर्शों से भरने की चिन्ता करने के बजाय चिन्ता थी 'नेहरू के बाद कौन?' और सिसायत के खेल खेले जाने लगे थे। उस सारी भयावह परिस्थितियों में उभरे बिंब को धर्मवीर भारती ने कई महीनों में कविता में ढाला- कविता का शीर्षक है- 'पुराना क़िला'

खा...मो..श !
बोलो मत...
एक भी आवाज़, एक भी सवाल, लबों की हल्की-सी जुम्बिश भी नहीं नहीं,
एक हल्की-सी दबी हुई सिसकी भी नहीं !
हर दीवार के कान हैं
और दीवार के इस पार का हर कान
दीवार के उस पार चुगलखोर मुँह बन जाता है
जहाँ शहंशाह
हकीमों, नजूमियों, खोजों और नक्शानवीसों से घिरे
अपनी ज़िंदगी की आख़िरी रात गुजार रहे हैं ! आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

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